स्वरूप और महत्व
हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार, मां कूष्मांडा सूर्यमंडल के भीतर के लोक में निवास करती हैं। उनकी कांति और तेज सूर्य के समान ही तेजस्वी है, और उनके प्रकाश से सभी दिशाएं प्रकाशित हो जाती हैं। उन्हें अष्टभुजा देवी भी कहा जाता है, क्योंकि उनकी आठ भुजाएं हैं। मां के हाथों में क्रमशः कमंडल, धनुष, बाण, कमल का पुष्प, अमृत से भरा कलश, चक्र, गदा और जपमाला है। उनकी सवारी शेर है, जो साहस और पराक्रम का प्रतीक है। मां कूष्मांडा की पूजा से भक्तों को मनवांछित फल की प्राप्ति होती है और वे जीवन में सभी बाधाओं को पार करने की शक्ति पाते हैं।
पूजा विधि और प्रसाद
नवरात्रि के चौथे दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें। इसके बाद, मां कूष्मांडा का ध्यान करते हुए मां दुर्गा को धूप, गंध, अक्षत, लाल पुष्प, फल, श्रृंगार का सामान और मिठाई अर्पित करें। पूजा के बाद मां को भोग लगाएं। मान्यता है कि मां कूष्मांडा को मालपुआ अति प्रिय है। इसके अलावा, दही और हलवे का भोग भी लगाया जा सकता है। पूजा के अंत में मां की आरती उतारें और उनके मंत्रों का जाप करें। यह भी माना जाता है कि देवी को उनका प्रिय भोग लगाने से भक्त को विशेष आशीर्वाद मिलता है।
शुभ रंग और प्रिय पुष्प
मां कूष्मांडा को लाल रंग के फूल बहुत प्रिय हैं, जिनमें लाल कमल, लाल गुड़हल और गेंदे के फूल प्रमुख हैं। ये फूल अर्पित करने से उनका विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है। नवरात्रि के चौथे दिन का शुभ रंग हरा माना गया है। इस दिन हरे रंग के वस्त्र पहनना शुभ माना जाता है, क्योंकि यह रंग मां कूष्मांडा को अत्यंत प्रिय है।
मंत्र और उपासना
मां कूष्मांडा की पूजा करते समय उनके मंत्रों का जाप करने से विशेष लाभ मिलता है। कुछ प्रमुख मंत्र इस प्रकार हैं
मां कूष्मांडा का मंत्र: ऊँ देवी कूष्माण्डायै नमः।
मां कूष्मांडा का बीज मंत्र: ऐं ह्रीं क्लीं कूष्मांडायै नमः।
इन मंत्रों का जाप करने से भक्तों को मां का आशीर्वाद प्राप्त होता है और उनके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है। मां कूष्मांडा की उपासना से भक्तों की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है और वे स्वस्थ जीवन जीते हैं।