Ranchi News : झारखंड अब सिर्फ खनिज संपदा के लिए नहीं, बल्कि भविष्य की हाईटेक दुनिया के एक नए संसाधन के लिए भी पहचान बना सकता है। सस्टेनेबल जस्ट ट्रांजिशन टास्क फोर्स और सेंटर फॉर एनवायरनमेंट एंड एनर्जी डेवलपमेंट (सीड) की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि राज्य में हर साल करीब 5500 टन ग्रीन ग्रेफीन उत्पादन की क्षमता मौजूद है। इससे झारखंड दुनिया के प्रमुख ग्रेफीन उत्पादक क्षेत्रों में शामिल हो सकता है।अनलॉकिंग ग्रेफीन इन कम्युनिटी-लेड एनर्जी ट्रांजिशन में बताया गया है कि ग्रेफीन को दुनिया का “वंडर मटेरियल” माना जाता है। इसका उपयोग तेजी से स्वच्छ ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स, बैटरी स्टोरेज, हेल्थ टेक्नोलॉजी और सस्टेनेबल मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में बढ़ रहा है।
झारखंड के पास ग्रेफीन उत्पादन के तीन बड़े स्रोत
विशेषज्ञों के अनुसार झारखंड के पास ग्रेफाइट, कोलबेड मीथेन और लाह जैसे ग्रेफीन उत्पादन के तीन बड़े स्रोत मौजूद हैं। यही वजह है कि राज्य को इस क्षेत्र में बड़ी रणनीतिक बढ़त मिल सकती है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि झारखंड देश का 55 प्रतिशत और दुनिया का 24 प्रतिशत लाह उत्पादन करता है। लाह से तैयार होने वाला ग्रीन ग्रेफीन पर्यावरण के अनुकूल माना जा रहा है। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई ताकत मिलने के साथ जनजातीय समुदायों और महिलाओं के लिए रोजगार के नए अवसर खुल सकते हैं।
सरकार और विशेषज्ञों ने बताई बड़ी संभावनाएं
वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के सचिव अबू बकर सिद्दिकी पी ने कहा कि ग्रेफीन जैसे प्राकृतिक संसाधन राज्य की अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकते हैं। सरकार ग्रामीण विकास, जलवायु अनुकूलन और औद्योगिक विकास को साथ लेकर दीर्घकालिक योजना पर काम कर रही है।
टास्क फोर्स के अध्यक्ष ए.के. रस्तोगी ने कहा कि झारखंड में मौजूद प्राकृतिक संसाधन, एमएसएमई नेटवर्क और रिसर्च संस्थान ग्रेफीन इकोनॉमी के लिए मजबूत आधार तैयार करते हैं। उन्होंने पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप और निवेश आधारित रोडमैप बनाने पर जोर दिया।
प्रधान मुख्य वन संरक्षक संजीव कुमार ने कहा कि लाह आधारित उद्योगों से सामुदायिक उद्यमशीलता और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। कार्यक्रम में मौजूद विशेषज्ञों ने राज्यभर में ग्रेफीन इकोसिस्टम, ग्रामीण वैल्यू चेन, मार्केट लिंकेज और हरित रोजगार के नए अवसर विकसित करने की जरूरत बताई।
कार्यक्रम में उद्योग जगत, शोध संस्थानों, तकनीकी विशेषज्ञों, सरकारी विभागों और सामुदायिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।