परंपरा और प्रोटोकॉल का संगम
सत्र की शुरुआत में जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सदन में दाखिल हुए, तो उन्होंने राज्यपाल के चरण स्पर्श कर सभी को चौंका दिया। भारतीय राजनीति में संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के बीच ऐसा शिष्टाचार कम ही देखने को मिलता है। समर्थकों का मानना है कि यह केवल एक राजनीतिक कदम नहीं, बल्कि भारतीय संस्कारों और संवैधानिक संस्थाओं के प्रति उनके गहरे सम्मान का प्रतीक है।
सियासत में आत्मीयता का पुट
वहीं, दूसरी ओर एक अन्य दृश्य ने सबका ध्यान खींचा, जिसमें मुख्यमंत्री एक अन्य नेता के कंधे पर हाथ रखकर बेहद आत्मीयता से बात करते नजर आए। यह तस्वीर नीतीश कुमार की उस छवि को पुख्ता करती है जिसमें वे एक अभिभावक की भूमिका में दिखते हैं। राजनीति की तल्खी के बीच इस तरह की सहजता यह संदेश देती है कि वैचारिक मतभेदों के बावजूद मानवीय संबंध सर्वोपरि हैं।
विपक्ष की नजर और सियासी मायने
जहाँ सत्ता पक्ष इसे मुख्यमंत्री की विनम्रता और शालीनता बता रहा है, वहीं विपक्ष इसे इमेज बिल्डिंग के तौर पर देख रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बिहार की राजनीति अब केवल आंकड़ों और विकास के दावों तक सीमित नहीं रही,अब नेताओं के हाव-भाव, उनके चलने-बोलने के तरीके और शिष्टाचार को भी भविष्य की रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है।
बजट सत्र के ये पल बताते हैं कि नीतीश कुमार अपनी राजनीति में सम्मान और सियासत का संतुलन बखूबी बनाना जानते हैं। अब देखना यह है कि मुख्यमंत्री का यह सॉफ्ट पावर आगामी चुनावों और गठबंधन की केमिस्ट्री में क्या रंग लाता है।