उत्सव बनाम मातम, 12 किमी का फासला और मीलों गहरी खाई
आज गोल्फ ग्राउंड में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और कल्पना सोरेन की मौजूदगी में आदिवासियों और मूलवासियों के उत्थान पर बड़े-बड़े भाषण दिए जा रहे हैं। विडंबना देखिए कि उसी समाज का एक बेटा अपनी मौत के बाद भी सम्मानजनक अंतिम संस्कार के लिए तरस रहा है। परिवार नियोजन की मांग को लेकर अड़ा है, लेकिन प्रशासन और बीसीसीएल प्रबंधन के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही।
आचार संहिता का बहाना, शोषण का नया पैमाना
बीसीसीएल प्रबंधन नियोजन देने के मामले में चुनाव आचार संहिता का हवाला दे रहा है। सवाल यह है कि एक पीड़ित परिवार की सामाजिक सुरक्षा और हक का चुनाव से क्या लेना-देना? क्या एक आदिवासी की मौत पर न्याय भी अब वोट और तारीखों के हिसाब से तय होगा? स्थानीय लोगों का आरोप है कि यह महज टालमटोल की नीति है।
विपक्ष और सत्ता पक्ष दोनों कटघरे में
पीड़ित परिवार के इस संघर्ष में अब तक केवल विधायक जयराम महतो ही साथ खड़े नजर आए। उन्होंने सीएमडी से वार्ता की, लेकिन वह भी विफल रही। सबसे दुखद पहलू यह है कि खुद को आदिवासियों का हितैषी बताने वाले अन्य नेता और नेत्रियां इस मामले में चुप्पी साधे हुए हैं।
एक तरफ करोड़ों का जश्न और दूसरी तरफ न्याय की भीख मांगता एक गरीब परिवार—क्या यही है अबुआ राज का सच जब तक सरकार और प्रशासन गहरी नींद से नहीं जागते, अर्जुन कोड़ा का शव व्यवस्था की संवेदनहीनता पर सवाल उठाता रहेगा।