Ranchi News: फर्जी बिटुमिन चालान से जुड़े मामले में सेवानिवृत्त सहायक अभियंता सुरेंद्र प्रसाद को न्यायमूर्ति दीपक रोशन की अदालत ने एक ही मामले से जुड़ी उनकी दो याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए विभागीय कार्रवाई में दी गई सजा को रद्द कर दिया है।
कोर्ट ने सुरेंद्र प्रसाद के वेतन में कटौती और सरकारी राशि की वसूली के आदेश को भी निरस्त कर दिया। इसके साथ ही विभागीय जांच रिपोर्ट और पुनर्विचार से संबंधित 3 जनवरी 2025 के Letter No. 26(S) को भी रद्द कर दिया गया।
गवाह के बिना विभागीय आरोप साबित नहीं किए जा सकते
हाईकोर्ट ने कहा कि विभागीय जांच में केवल CBI की चार्जशीट या जांच के दौरान जुटाए गए दस्तावेजों के आधार पर किसी कर्मचारी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। दस्तावेजों में दर्ज आरोपों को सक्षम गवाह के माध्यम से साबित करना जरूरी है, ताकि संबंधित कर्मचारी को गवाह से जिरह करने का अवसर मिल सके।
अदालत ने पाया कि इस मामले में विभागीय जांच के दौरान कथित फर्जी चालान, CBI के दस्तावेज, बिटुमिन की कमी, सुरेंद्र प्रसाद की जिम्मेदारी और सरकारी नुकसान से जुड़े आरोपों को साबित करने के लिए विभाग की ओर से कोई गवाह पेश नहीं किया गया था।
सरकारी नुकसान की रकम भी स्पष्ट नहीं कर पाया विभाग
कोर्ट ने यह भी पाया कि विभाग यह स्पष्ट नहीं कर सका कि बिटुमिन की कितनी मात्रा कम इस्तेमाल हुई, उसकी वास्तविक कीमत कितनी थी और ठेकेदार से कितनी राशि की वसूली की जानी थी।
अदालत ने कहा कि सुरेंद्र प्रसाद की व्यक्तिगत लापरवाही या जिम्मेदारी के कारण सरकारी खजाने को कितना नुकसान हुआ, यह भी ठोस सबूतों से साबित नहीं किया गया। ऐसे में बिना स्पष्ट हिसाब और पुख्ता प्रमाण के किसी कर्मचारी के वेतन या पेंशन से राशि की वसूली का आदेश नहीं दिया जा सकता।
12 सप्ताह में देना होगा सभी परिणामी लाभ
हाईकोर्ट ने सुरेंद्र प्रसाद को उन सभी परिणामी लाभों का हकदार माना, जो विभागीय कार्रवाई और सजा के कारण उन्हें नहीं मिल पाए थे। अदालत ने संबंधित अधिकारियों को रिकॉर्ड की जांच कर इन लाभों की गणना करने और आवश्यक आदेश जारी करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि आदेश की प्रति प्राप्त होने के 12 सप्ताह के भीतर सुरेंद्र प्रसाद को सभी पात्र लाभ उपलब्ध कराए जाएं।
2004-05 के सड़क निर्माण कार्य से जुड़ा था मामला
पूरा मामला वर्ष 2004-05 में बानो PWD रोड से पबुरा-निमतुर-पनगुर पथ के निर्माण और मरम्मत कार्य से जुड़ा है। उस समय सुरेंद्र प्रसाद ग्रामीण अभियंत्रण संगठन, वर्तमान में ग्रामीण कार्य विभाग में सहायक अभियंता के पद पर कार्यरत थे। वह वर्ष 2019 में सेवानिवृत्त हुए।
विभाग का आरोप था कि ठेकेदार ने बिटुमिन की खरीद से जुड़े फर्जी चालान जमा किए थे और सुरेंद्र प्रसाद ने उन पर काउंटर साइन किया था। आरोप था कि इसके चलते ठेकेदार को अनुचित भुगतान हुआ और सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचा।
CBI जांच के आधार पर सुरेंद्र प्रसाद के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू की गई थी। उन्हें वर्ष 2019 में आपराधिक मामले में दोषी भी ठहराया गया था। हालांकि, उनकी अपील पर झारखंड हाईकोर्ट ने 15 मई 2024 को उन्हें बरी कर दिया था। अब हाईकोर्ट ने विभागीय जांच में पर्याप्त साक्ष्य और गवाह पेश नहीं किए जाने को आधार मानते हुए विभाग की ओर से दी गई सजा को रद्द कर दिया है।