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  • 2026-02-22

Jharkhand News: झारखंड के 30,000 पुराने वृक्षों की जेनेटिक मैपिंग से पता चलेगा 100 साल का इतिहास

Jharkhand News: झारखंड के जंगलों में खड़े हजारों साल पुराने वृक्ष अब बीते कल की कहानियां सुनाएंगे. केंद्र सरकार की एक महत्वाकांक्षी योजना के तहत राज्य के 30,000 से अधिक पुराने वृक्षों की जेनेटिक मैपिंग (Genetic Mapping) करने की तैयारी है. इस अध्ययन से न केवल वृक्षों के स्वास्थ्य, बल्कि पिछले एक सदी के मौसम और मिट्टी में आए बदलावों का भी खुलासा होगा.

क्या है जेनेटिक मैपिंग और यह क्यों जरूरी है?
वृक्षों का अपना एक जटिल “कम्यूनिकेशन सिस्टम” और जेनेटिक कोड होता है. जब विशेषज्ञ इनका आनुवांशिक अध्ययन करेंगे, तो उन्हें डेटाबेस तैयार करने में मदद मिलेगी जिससे निम्नलिखित जानकारियां मिलेंगी:
• मौसम का इतिहास: पिछले 100 वर्षों में किस अवधि में कैसा मौसम रहा, इसका सटीक विवरण वृक्षों के रिंग्स और उनके डीएनए से मिल सकेगा.
• मिट्टी का स्वास्थ्य: समय के साथ मिट्टी के पोषक तत्वों में क्या बदलाव आए और अपरदन (Erosion) का उन पर क्या असर पड़ा.
• वाटर बॉडी की खोज: जंगलों के भीतर छिपे पुराने जल स्रोतों और नमी के स्तर की जानकारी भी इस शोध से मिलेगी.

इमारती लकड़ियों के गिरते ग्राफ की मिलेगी वजह
झारखंड अपनी प्राकृतिक संपदा जैसे साल, शीशम, गम्हार और महुआ के लिए प्रसिद्ध है. लेकिन पिछले 25 वर्षों से देखा जा रहा है कि इन पेड़ों का प्राकृतिक विकास (Natural Regeneration) धीमा हो गया है.
• अध्ययन का लाभ: जेनेटिक मैपिंग से उन तत्वों की पहचान होगी जो इन पेड़ों के विकास को रोक रहे हैं.
• अनुकूलता की जांच: भविष्य में झारखंड की मिट्टी के लिए कौन से वृक्ष सबसे अधिक अनुकूल होंगे, इसका वैज्ञानिक आधार तैयार किया जा सकेगा.

रांची और सारंडा के जंगलों पर विशेष नजर
भूगर्भ शास्त्रियों और पर्यावरणविदों के अनुसार, रांची के आसपास (अनगढ़ा से ओरमांझी तक) प्राकृतिक जल स्रोतों के कारण पारिस्थितिकी संतुलन अभी भी बना हुआ है.
• अध्ययन क्षेत्र: सारंडा और साहिबगंज के घने जंगलों में अभी भी अत्यंत पुराने वृक्ष मौजूद हैं, जिनका डेटाबेस वन विभाग के पास उपलब्ध है.
• डेटा शेयरिंग: केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय इस अध्ययन के परिणामों को राज्य सरकार के साथ साझा करेगा, जिससे वनीकरण (Afforestation) और संरक्षण की नई नीतियां बनाने में आसानी होगी.

वृक्षों की जेनेटिक मैपिंग केवल एक वैज्ञानिक प्रयोग नहीं, बल्कि भविष्य के पर्यावरणीय संकट से निपटने का एक “ब्लूप्रिंट” है. झारखंड जैसे राज्य के लिए, जहां की एक बड़ी आबादी वनों पर निर्भर है, यह जानना बेहद जरूरी है कि बदलते क्लाइमेट चेंज के दौर में हमारे जंगल कितने सुरक्षित हैं. यह तकनीक हमें बताएगी कि हमें केवल नए पेड़ नहीं लगाने हैं, बल्कि वैसे पेड़ लगाने हैं जो भविष्य की कठोर जलवायु को झेल सकें.
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