Jharkhand News: झारखंड में वर्ष 2025 नक्सल विरोधी अभियानों के लिहाज से अहम साबित हुआ है. भाकपा माओवादी और उससे जुड़े अन्य स्पलिंटर ग्रुप अब राज्य में हाशिये पर पहुंच चुके हैं. वर्तमान स्थिति में पश्चिमी सिंहभूम का चाईबासा जिला ही ऐसा इलाका है, जिसे घोर नक्सल प्रभावित माना जा रहा है. इसके अलावा चार जिले ही अब सेक्यूरिटी रिलेटेड एक्सपेंडेचर श्रेणी में रह गए हैं, जबकि पांच साल पहले तक झारखंड के 19 जिले नक्सल प्रभाव की जद में आते थे.
सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई का असर
राज्य में सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई का असर यह है कि भाकपा माओवादी की सेंट्रल कमेटी के केवल तीन उग्रवादी ही अब झारखंड में बचे हैं. पीएलएफआई, जेजेएमपी और टीपीसी जैसे संगठन लगभग निष्क्रिय हो चुके हैं. बोकारो के झुमरा और लुगू क्षेत्र में 2025 के दौरान माओवादियों का आखिरी दस्ता भी खत्म कर दिया गया. इस दौरान रणविजय महतो की गिरफ्तारी हुई और उसके सहयोगी मुठभेड़ में मारे गए.
उत्तरी छोटानागपुर क्षेत्र में एक करोड़ के इनामी विवेक उर्फ प्रयाग मांझी और सहदेव सोरेन जैसे शीर्ष माओवादी नेताओं के मारे जाने के बाद इस इलाके से संगठन का पूरी तरह सफाया हो गया. कभी झुमरा और पारसनाथ को माओवादियों का गढ़ माना जाता था, लेकिन अब वहां उनकी मौजूदगी इतिहास बन चुकी है.
नक्सल प्रभाव के तेजी से सिमटने का संकेत
लगातार दबाव के चलते माओवादियों को सारंडा में भी बार-बार ठिकाने बदलने पड़े. फिलहाल सारंडा के एक सीमित हिस्से में ही मिसिर बेसरा, पतिराम मांझी उर्फ अनल और असीम मंडल का छोटा दस्ता सक्रिय बताया जा रहा है. इनके साथ अब 40 से भी कम सशस्त्र माओवादी बचे हैं. मार्च 2025 तक जहां एसआरई जिलों की संख्या नौ थी, वहीं अक्तूबर 2025 तक यह घटकर चार रह गई, जो नक्सल प्रभाव के तेजी से सिमटने का संकेत है.
माओवाद के खात्मे की समय-सीमा 31 मार्च 2026
केंद्र सरकार ने देशभर से माओवाद के खात्मे की समय-सीमा 31 मार्च 2026 तय की है. झारखंड में भी इसी लक्ष्य के तहत केंद्रीय बलों की नौ बटालियनों की तैनाती के साथ अभियान चलाया जा रहा है. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2016 से सितंबर 2025 के बीच राज्य में 4,147 नक्सलियों की गिरफ्तारी हुई है. सबसे अधिक गिरफ्तारियां 2017 में दर्ज की गईं. इसी अवधि में 242 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण भी किया है.
सारंडा इलाका पूरी तरह नक्सल मुक्त होना बाकी
अभी भी चुनौतियां पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं. पश्चिमी सिंहभूम का सारंडा इलाका पूरी तरह नक्सल मुक्त होना बाकी है. शीर्ष माओवादी नेताओं के साथ बचे हुए सशस्त्र दस्तों की गतिविधियां सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती बनी हुई हैं.
अंतिम चरण की कार्रवाई सबसे चुनौतीपूर्ण होगी
झारखंड में नक्सल प्रभाव का दायरा तेजी से सिमटना सुरक्षा बलों की रणनीति और लगातार अभियानों की सफलता को दर्शाता है. हालांकि कुछ सीमित इलाकों में अब भी सक्रिय माओवादी नेटवर्क यह संकेत देते हैं कि अंतिम चरण की कार्रवाई सबसे चुनौतीपूर्ण होगी. 2026 की समय सीमा तक नक्सलवाद के पूर्ण खात्मे के लिए निरंतर दबाव और स्थानीय स्तर पर मजबूत खुफिया तंत्र निर्णायक भूमिका निभाएगा.