Jharkhand News: हजारीबाग एनटीपीसी के फॉरेस्ट क्लीयरेंस की शर्तों के उल्लंघन में सड़क मार्ग से कोयला परिवहन का मामला अब वन विभाग के भीतर गंभीर टकराव का रूप ले चुका है. इस विवाद की शुरुआत तब हुई, जब वन संरक्षक द्वारा गठित दो सदस्यीय जांच समिति की अंतरिम रिपोर्ट सामने आने के बाद क्षेत्रीय मुख्य वन संरक्षक रवींद्र नाथ मिश्रा पर रिपोर्ट दबाने और गलत कार्रवाई करने के आरोप लगने लगे.
बताया गया कि RCCF मिश्रा ने कार्रवाई के नाम पर वरिष्ठ अधिकारियों का हवाला देते हुए जांच समिति के दोनों सहायक वन संरक्षकों से स्पष्टीकरण मांगा था. लेकिन इस आदेश की वैधता पर सवाल तब खड़ा हुआ, जब प्रधान मुख्य वन संरक्षक द्वारा सचिव को लिखे गए पत्र में खुलासा हुआ कि आपत्ति किसी वरिष्ठ अधिकारी की नहीं, बल्कि स्वयं RCCF मिश्रा की थी. इस पत्र ने मिश्रा के दावे को पूरी तरह गलत साबित कर दिया.
मामला उजागर होने के बाद पश्चिमी वन प्रमंडल के सहायक वन संरक्षक अविनाश कुमार परमार ने मुख्यमंत्री को विस्तृत शिकायत भेजकर RCCF मिश्रा के खिलाफ कठोर कार्रवाई और उच्चस्तरीय जांच की मांग की है. शिकायत की प्रतिलिपि भारत सरकार, राज्यपाल और मुख्य सचिव को भी भेजी गई है.
ACF परमार ने आरोप लगाया कि जांच समिति की अंतरिम रिपोर्ट पांच महीने पहले वन संरक्षक को सौंपी गई थी, लेकिन इस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई. हैरानी की बात यह भी है कि RCCF मिश्रा ने इस देरी पर एक भी सवाल नहीं उठाया, बल्कि अचानक जांच समिति के सदस्यों से ही स्पष्टीकरण मांग लिया. इससे संदेह गहराया है कि रिपोर्ट जानबूझकर RCCF की सहमति से दबाकर रखी गई, ताकि उस अधिकारी को बचाया जा सके जिसके विरुद्ध जांच की जा रही थी.
प्रधान मुख्य वन संरक्षक द्वारा 2 अगस्त 2025 को भेजे गए पत्रांक 1850 में यह स्पष्ट किया गया कि अंतरिम रिपोर्ट पर आपत्ति स्वयं RCCF मिश्रा ने दर्ज की थी और वन संरक्षक को स्पष्टीकरण मांगने का निर्देश भी उन्होंने ही दिया था. लेकिन अपने पत्र में RCCF ने दावा किया था कि यह कार्रवाई वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश पर की गई थी, जो PCCF के दस्तावेज से पूरी तरह खारिज हो गया.
इन पत्रों के सामने आने के बाद वन विभाग में हलचल बढ़ गई है. आरोप है कि RCCF मिश्रा ने न केवल तथ्यों को छिपाया, बल्कि वरिष्ठ अधिकारियों का हवाला देकर गलत दावा भी किया और जांच समिति के दोनों अधिकारियों पर प्रतिशोधात्मक कार्रवाई की कोशिश की. मामले में विभागीय कार्रवाई की मांग अब तेज हो गई है.
यह प्रकरण सिर्फ एक जांच रिपोर्ट के दबाने भर का मामला नहीं है, बल्कि विभागीय पारदर्शिता, जवाबदेही और पद का दुरुपयोग जैसे गंभीर सवाल खड़े करता है. जांच समिति की रिपोर्ट को पांच महीने तक रोके रखना और फिर अधिकारियों पर ही स्पष्टीकरण थोपना यह संकेत देता है कि विभाग में निर्णय प्रक्रिया किस स्तर पर प्रभावित होती रही है. PCCF के पत्र ने स्थिति को और जटिल बना दिया है, क्योंकि इससे साफ है कि वरिष्ठ अधिकारियों का गलत हवाला देकर गलत कदम को सही ठहराने की कोशिश हुई. यदि उच्चस्तरीय जांच होती है, तो यह मामला आने वाले समय में वन विभाग के प्रशासनिक ढांचे पर बड़ा प्रभाव डाल सकता है.