Bihar Elections 2025: बिहार में विधानसभा चुनाव के लिए सभी पार्टियों ने अपनी तैयारी तेज कर दी है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार शारीरिक और राजनीतिक रूप से इस चुनाव में कमजोर नजर आ रहे है, लेकिन इस बार नीतीश की जेडीयू मोदी ब्रांडिंग को सामने रखकर चुनाव लड़ने की तैयारी में है. वहीं नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव और कांग्रेस के बीच सीटों को लेकर पेंच फंसता दिखाई दे रहा है. इसके साथ ही चुनाव आयोग भी बिहार चुनाव को लेकर अपनी तैयारियों को अंतिम रूप देने में जुटा हुआ हैं ताकि जल्द ही बिहार चुनाव की तारीखों का ऐलान किया सके, सूत्रों की माने तो छठ पूजा के बाद बिहार में कभी भी आचार संहिता लागू हो सकता है और चुनाव आयोग तारीखों की घोषणा कर सकता हैं.
आपको बता दें कि बिहार विधानसभा का वर्तमान कार्यकाल 22 नवंबर 2025 को समाप्त हो जाएगा. इसलिए हर हाल में नवंबर तक चुनाव होने है. वहीं पिछला विधानसभा चुनाव साल 2020 में कोरोना महामारी के साये में 3 चरणों में 28 अक्टूबर से 7 नवंबर के बीच हुआ था.
इसी बीच भारतीय निर्वाचन आयोग ने SIR यानी गहन मतदाता पुनरीक्षण के आंकड़े जारी कर दिए है. जारी आकंड़ों पर नजर डालें तो बिहार में 7.42 करोड़ मतदाता हैं. चुनाव आयोग ने बिहार चुनाव से चंद महीने पहले SIR शुरू किया. विपक्षी दलों ने इसकी टाइमिंग को लेकर कई तरह के सवाल उठायें, लेकिन चुनाव आयोग ने SIR को वोटर लिस्ट दुरुस्त करने की प्रक्रिया करार दिया.
बिहार की राजनीति: 2020 से 2025 तक का सियासी सफर और आने वाले विधानसभा चुनाव की जंग
बिहार की राजनीति हमेशा उतार-चढ़ाव और गठबंधन की जोड़-तोड़ से भरी रही है. 2020 के विधानसभा चुनाव के बाद एनडीए सत्ता में लौटा, लेकिन इसके बाद जो घटनाक्रम घटा, उसने राज्य की राजनीति को एक बार फिर राष्ट्रीय सुर्खियों में ला दिया.
2020 के नतीजों के बाद जनता दल (यूनाइटेड) और भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई में एनडीए की सरकार बनी. नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने, जबकि बीजेपी को राज्य की सबसे बड़ी पार्टी होने का फायदा विधानसभा अध्यक्ष से लेकर कई अहम पदों पर मिला. लेकिन यह साझेदारी ज्यादा दिनों तक नहीं चल सकी. अगस्त 2022 में नीतीश कुमार ने अचानक बीजेपी से नाता तोड़ लिया और महागठबंधन का हिस्सा बनते हुए एक बार फिर राजनीतिक समीकरण बदल दिए.
यह तल्खी इतनी बढ़ गई कि नीतीश कुमार ने सार्वजनिक मंच से कह दिया कि “अब मर जाएंगे, लेकिन बीजेपी के साथ कभी नहीं जाएंगे.” दूसरी ओर, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी बयान देकर साफ कर दिया कि नीतीश कुमार के लिए एनडीए के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो चुके हैं. लेकिन राजनीति की यही खूबी है कि इसमें कुछ भी स्थायी नहीं होता.
इसी का नतीजा था कि 2024 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले एक और बड़ा पलटवार हुआ. जनवरी 2024 में नीतीश कुमार ने आरजेडी से किनारा कर एक बार फिर एनडीए का दामन थाम लिया. यह वही गठबंधन था जिसे छोड़ते हुए उन्होंने दो साल पहले कड़े शब्दों में अस्वीकार कर दिया था. राजनीति के इस खेल ने बिहार के मतदाताओं को भी चौंकाया और विपक्षी दलों को नए सिरे से रणनीति बनाने पर मजबूर कर दिया.
बिहार विधानसभा की वर्तमान तस्वीर
बिहार विधानसभा की कुल 243 सीटें हैं और सत्ता की कुर्सी तक पहुंचने के लिए किसी भी दल या गठबंधन को जादुई आंकड़ा 122 चाहिए.
वर्तमान समय में स्थिति इस प्रकार है:
1. बीजेपी के पास 80 विधायक
2. आरजेडी के पास 77 विधायक
3. जेडीयू के पास 45 विधायक
4. कांग्रेस के पास 19 विधायक
5. सीपीआई (माले) लिबरेशन के पास 11 विधायक
6. हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) के पास 4 विधायक
7. सीपीएम और सीपीआई के पास 2-2 विधायक
8. एआईएमआईएम के पास 1 विधायक
9. 2 निर्दलीय विधायक
फिलहाल जेडीयू और बीजेपी सहित अन्य सहयोगी दलों के साथ एनडीए सत्ता में है. वहीं विपक्ष में तेजस्वी यादव नेता प्रतिपक्ष की भूमिका निभा रहे हैं.
कौन किसके साथ? गठबंधन की जंग
2025 का चुनाव एक बार फिर एनडीए बनाम महागठबंधन की सीधी टक्कर के रूप में देखा जा रहा है.
एनडीए में जेडीयू, बीजेपी, चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास), जीतनराम मांझी की हम (सेक्युलर) और उपेंद्र कुशवाहा का राष्ट्रीय लोक मोर्चा शामिल हैं.
वहीं महागठबंधन की तरफ से आरजेडी, कांग्रेस, सीपीआई, सीपीएम, सीपीआई (माले), विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी), झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) और राष्ट्रीय एलजेपी चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है.
असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम इस बार भी किसी गठबंधन का हिस्सा नहीं है. 2020 के चुनाव में उन्होंने पांच सीटें जीती थीं, लेकिन बाद में चार विधायक आरजेडी में शामिल हो गए.
सीट बंटवारे की पेचीदगियां और नए खिलाड़ी
अब तक न तो एनडीए और न ही महागठबंधन ने सीट बंटवारे पर अंतिम रूप से सहमति जताई है. छोटे-छोटे दल “सम्मानजनक हिस्सेदारी” की मांग कर रहे हैं, जिससे दोनों खेमों में खींचतान चल रही है. इसके अलावा कई नए खिलाड़ी चुनाव को और रोचक बना रहे हैं.
नीतीश कुमार की सेहत को लेकर लगातार अटकलें लगाई जा रही हैं, साथ ही जेडीयू में उनके उत्तराधिकारी को लेकर भी चर्चा तेज है. चुनावी अखाड़े में प्रशांत किशोर भी उतर चुके हैं. उन्होंने घोषणा की है कि उनकी पार्टी सभी 243 सीटों पर उम्मीदवार उतारेगी और बेरोजगारी, पलायन और शिक्षा जैसे मुद्दों को मुख्य एजेंडा बनाएगी. प्रशांत किशोर के शब्दों में “या तो पार्टी अर्श पर होगी या फर्श पर.” वहीं लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव ने पार्टी से अलग होकर अपनी नई पार्टी जनशक्ति जनता दल बनाई है. इसका असर महागठबंधन के वोट बैंक पर कितना पड़ेगा, यह देखने वाली बात होगी.
चुनावी मुद्दों की गर्माहट
एनडीए सरकार विकास और महिलाओं-युवाओं के लिए शुरू की गई योजनाओं को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि बता रही है. उनका दावा है कि सरकार ने हर वर्ग तक योजनाएं पहुंचाई हैं और अब बिहार को नए दौर में ले जा रही है.
इसके उलट महागठबंधन बेरोजगारी, पेपर लीक और SIR जैसे मुद्दों को जोर-शोर से उठा रहा है. तेजस्वी यादव और राहुल गांधी लगातार “वोट चोरी” और “बेरोजगारी” को लेकर एनडीए पर हमला कर रहे हैं.
विपक्ष का कहना है कि अगर एनडीए सत्ता में रही तो बिहार की शिक्षा और रोजगार व्यवस्था पूरी तरह चौपट हो जाएगी. वहीं एनडीए का आरोप है कि विपक्ष केवल भ्रम फैलाकर राजनीति कर रहा है और जनता अब विकास का विरोध करने वालों को सबक सिखाएगी.
बिहार के चुनावी इतिहास पर एक नजर
बिहार में विधानसभा चुनाव की शुरुआत 1952 से हुई थी. स्वतंत्र भारत के पहले चुनाव में कांग्रेस ने भारी बहुमत से जीत हासिल की थी.
1. 1951 के चुनाव में कांग्रेस ने 322 में से 239 सीटें पाईं.
2. 1957 में कांग्रेस को 312 में से 210 सीटें मिलीं.
3. 1962 में कांग्रेस ने 318 में से 185 सीटें जीत लीं.
बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिन्हा बने थे. इसके बाद धीरे-धीरे राजनीति में बदलाव आया और 1990 के दशक से लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार ने लंबे समय तक राज्य की सत्ता पर प्रभाव बनाए रखा.
2005 का चुनाव भी खास रहा. फरवरी में विधानसभा चुनाव के बाद कोई भी दल सरकार नहीं बना पाया था. नतीजतन, उसी साल अक्टूबर में दोबारा चुनाव कराना पड़ा.
बिहार की राजनीति में गठबंधन और टूट-फूट का सिलसिला लगातार जारी है. नीतीश कुमार की पलटवार राजनीति, तेजस्वी यादव की नई ऊर्जा, प्रशांत किशोर की चुनौती और छोटे दलों की “किंगमेकर” वाली भूमिका, यह सब मिलकर बिहार विधानसभा चुनाव 2025 को बेहद दिलचस्प बना रहा है.