Jharkhand News: हथियार लहराकर तालिबानी अंदाज में व्यापारियों को धमकाने वाला कुख्यात अपराधी उत्तम यादव आखिरकार पुलिस मुठभेड़ में ढेर हो गया. हजारीबाग और चतरा पुलिस की संयुक्त कार्रवाई में एसआईटी ने उसे मार गिराया. एनकाउंटर के दौरान उसने पुलिस पर फायरिंग भी की, लेकिन जवाबी कार्रवाई में गोली लगने से उसकी मौत हो गई.
उत्तम यादव पर बिहार पुलिस ने 50 हजार का इनाम रखा था. उसके खिलाफ हत्या, रंगदारी और फायरिंग जैसे कई मामले दर्ज थे. कारोबारियों और ठेकेदारों को जान से मारने की धमकी देकर लेवी वसूलना उसका धंधा बन चुका था. 22 जून को उसने हजारीबाग में एक ज्वेलर्स की दुकान पर गोलीबारी की थी. लगातार रंगदारी मांगने और धमकाने के बाद पुलिस ने उसके गुर्गों की गिरफ्तारियां भी कीं. 29 जून को 9 गुर्गे और 27 जुलाई को 4 गुर्गे पकड़े गए. लेकिन गिरोह का सरगना खुलेआम दहशत फैलाता रहा.
अब सवाल उठता है कि जब उसके खिलाफ इतने गंभीर केस दर्ज थे तो वह खुलेआम कैसे घूम रहा था. क्यों एक 50 हजार का इनामी अपराधी महीनों तक हजारीबाग और चतरा की गलियों में बेखौफ घूमता रहा. क्या पुलिस को सिर्फ तब सक्रिय होना पड़ता है जब व्यापारी गोली खाने लगते हैं और मीडिया में खबरें सुर्खियां बनने लगती हैं. अगर उत्तम यादव को पहले ही दबोच लिया गया होता तो क्या दर्जनों व्यापारी दहशत में जीने को मजबूर होते. आखिर क्यों झारखंड की सरकार और पुलिस प्रशासन अपराधियों को पनपने देते हैं और फिर बाद में एनकाउंटर कर अपनी पीठ थपथपाते हैं.
झारखंड में अपराधियों का मनोबल इतना बढ़ चुका है कि वे तालिबानी अंदाज में वीडियो बनाकर व्यापारियों को धमकाते हैं, और प्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठा रहता है. सवाल यह है कि क्या यह प्रशासन की नाकामी नहीं है. क्या यह साबित नहीं करता कि अपराधियों और पुलिस के बीच कहीं न कहीं मिलीभगत है, तभी तो सरगना महीनों तक बेलगाम चलता रहा.
उत्तम यादव का मारा जाना राहत की खबर जरूर है, लेकिन यह झारखंड की सुरक्षा व्यवस्था पर एक बड़ा सवालिया निशान भी है. अपराधी तब तक खुला घूमता रहा जब तक पुलिस ने गोली नहीं चलाई. तो क्या अब झारखंड में न्याय सिर्फ गोलियों के दम पर ही होगा.
सरकार और पुलिस को जवाब देना होगा कि आखिर अपराधियों को फलने-फूलने की छूट क्यों दी जाती है, और आम नागरिकों की सुरक्षा कब सुनिश्चित होगी.