Ranchi News: कांटाटोली स्थित खादगढ़ा बस स्टैंड की बंदोबस्ती को लेकर नगर निगम की प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो गए हैं। पहले ऑनलाइन टेंडर में सबसे अधिक बोली 7.50 करोड़ रुपये तक पहुंचने के बावजूद टेंडर रद्द कर दिया गया। इसके बाद कराए गए दूसरे टेंडर में बंदोबस्ती करीब 3.20 करोड़ रुपये में तय किए जाने की जानकारी सामने आई है। दोनों प्रक्रियाओं में सामने आई रकम के बड़े अंतर ने टेंडर की पारदर्शिता और नगर निगम को संभावित राजस्व नुकसान को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।
7.50 करोड़ की बोली के बाद टेंडर रद्द होने पर सवाल
पहली ऑनलाइन टेंडर प्रक्रिया में 7.50 करोड़ रुपये की अधिकतम बोली मिलने के बावजूद इसे निरस्त किए जाने को लेकर अब सवाल उठ रहे हैं। खास तौर पर यह जानने की कोशिश की जा रही है कि इतनी बड़ी बोली मिलने के बाद टेंडर को रद्द करने का निर्णय किस आधार पर लिया गया था।
मामले में यह भी सवाल उठाया गया है कि यदि पहली टेंडर प्रक्रिया में तकनीकी या प्रक्रियागत खामी थी, तो उसे दूर करने के लिए क्या कदम उठाए गए। टेंडर रद्द करने के पीछे किसी कानूनी आधार का इस्तेमाल किया गया था या नहीं, इसकी भी जांच की मांग की गई है।
मेयर रौशनी खलखो ने नगर आयुक्त से मांगी पूरी फाइल
मामले को गंभीरता से लेते हुए मेयर रौशनी खलखो ने नगर आयुक्त को पत्र भेजकर पूरी प्रक्रिया की जांच कराने का निर्देश दिया है। उन्होंने पहले और दूसरे ऑनलाइन टेंडर से संबंधित सभी दस्तावेज उपलब्ध कराने को कहा है।
मेयर ने स्पष्ट किया है कि जांच के दौरान यदि किसी अधिकारी की लापरवाही या किसी प्रकार की अनियमितता सामने आती है तो जिम्मेदार अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए।
टेंडर रद्द करने के आदेश से लेकर एजेंसी की जानकारी मांगी
नगर आयुक्त को भेजे गए पत्र में मेयर ने पहले टेंडर को निरस्त करने से संबंधित आदेश और अधिकारियों की ओर से की गई टिप्पणियों की फाइल मांगी है। इसके साथ ही पहली प्रक्रिया में बोली लगाने वाली एजेंसी का पूरा विवरण और टेंडर रद्द किए जाने की वजह भी उपलब्ध कराने को कहा गया है।
मेयर ने यह भी जानना चाहा है कि 7.50 करोड़ रुपये की अधिकतम बोली मिलने के बाद टेंडर निरस्त करने का आदेश किस स्तर से जारी हुआ था।
3.20 करोड़ की दूसरी बंदोबस्ती पर राजस्व का सवाल
पहली प्रक्रिया में 7.50 करोड़ रुपये की अधिकतम बोली और दूसरी प्रक्रिया में करीब 3.20 करोड़ रुपये में बंदोबस्ती तय होने की बात सामने आने के बाद दोनों रकम के बीच लगभग 4.30 करोड़ रुपये का अंतर है। इसी अंतर को लेकर नगर निगम के संभावित राजस्व नुकसान का मुद्दा भी उठ रहा है।
अब जांच में यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि पहली टेंडर प्रक्रिया को रद्द करने का आधार क्या था, दूसरी प्रक्रिया किस तरह पूरी की गई और दोनों टेंडर में इतनी बड़ी राशि का अंतर क्यों सामने आया। मेयर की ओर से मांगे गए दस्तावेजों और जांच के बाद ही पूरे मामले की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।