Jharkhand High Court News: झारखंड हाईकोर्ट ने जमानत की शर्तों को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है. कोर्ट ने कहा कि किसी आरोपी को जमानत देते समय ऐसी शर्त नहीं रखी जा सकती, जिसे पूरा करना उसके लिए बहुत मुश्किल हो. अगर शर्त इतनी कठिन है कि आरोपी उसे पूरा ही न कर पाए, तो जमानत का फायदा देने का कोई मतलब नहीं रह जाता. यह बात जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की अदालत ने सपथ कुमार चंद्र उर्फ सपथ कुमार चांद की याचिका पर सुनवाई के दौरान कही.
2014 से चला आ रहा है मामला
सपथ कुमार चंद्र को वर्ष 2014 में इस मामले में अग्रिम जमानत मिली थी. उस समय कोर्ट ने जमानत के साथ कुछ लोगों को बैंक ड्राफ्ट देने की शर्त भी रखी थी. याचिकाकर्ता के मुताबिक, उस समय वह जरूरी रकम की व्यवस्था नहीं कर पाए. इस वजह से वह निचली अदालत में सरेंडर नहीं कर सके. अब उन्होंने रकम की व्यवस्था कर ली है. उन्होंने हाईकोर्ट से सरेंडर करने के लिए दो सप्ताह का समय मांगा.
सरकार ने जताई आपत्ति
राज्य सरकार ने याचिका का विरोध किया. सरकार की ओर से कहा गया कि अग्रिम जमानत मिलने के बावजूद याचिकाकर्ता ने करीब 12 साल तक सरेंडर नहीं किया. अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं. इसके बाद जमानत की शर्तों और मामले की परिस्थितियों पर विचार किया.
कोर्ट ने बताई जमानत की शर्तों की सीमा
हाईकोर्ट ने कहा कि जमानत की शर्त ऐसी होनी चाहिए, जिसे आरोपी वास्तविक रूप से पूरा कर सके. किसी ऐसी शर्त को आधार नहीं बनाया जा सकता, जो जमानत को ही बेअसर कर दे. कोर्ट ने माना कि जमानत देने के बाद आरोपी को उसका लाभ मिलना भी जरूरी है. इसी आधार पर अदालत ने सपथ कुमार चंद्र को दो सप्ताह के भीतर निचली अदालत में सरेंडर करने की अनुमति दे दी. इस टिप्पणी को जमानत की शर्तों को लेकर एक महत्वपूर्ण न्यायिक दिशा के तौर पर देखा जा रहा है.