Industry Legal Definition: सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ गुरुवार को औद्योगिक विवाद कानून के तहत उद्योग की कानूनी परिभाषा को लेकर अपना अहम फैसला सुनाने जा रही है. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले में सभी पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद 19 मार्च को फैसला सुरक्षित रखा था. अदालत के निर्णय से यह स्पष्ट होगा कि अस्पताल, शिक्षण संस्थान, क्लब, सरकारी विभाग और समाज कल्याण से जुड़ी गतिविधियां किन परिस्थितियों में उद्योग के दायरे में आएंगी.
1978 के फैसले ने बदली थी उद्योग की परिभाषा
इस मामले की जड़ 1978 में आए बेंगलूरू जल आपूर्ति एवं सीवरेज बोर्ड बनाम राजप्पा फैसले से जुड़ी है. उस समय सुप्रीम कोर्ट की सात सदस्यीय पीठ ने न्यायमूर्ति वीआर कृष्ण अय्यर की अगुवाई में उद्योग की परिभाषा को काफी व्यापक रूप दिया था.
इस व्याख्या के बाद कई ऐसे संस्थान भी औद्योगिक विवाद कानून के दायरे में आ गए, जिन्हें आम तौर पर उद्योग की श्रेणी में नहीं रखा जाता था. इसका सीधा असर अस्पतालों, स्कूलों, कॉलेजों और सरकारी कल्याणकारी योजनाओं से जुड़े कर्मचारियों पर पड़ा.
इस फैसले के आधार पर इन संस्थानों में काम करने वाले कर्मचारियों और श्रमिकों को अपने रोजगार से जुड़े अधिकारों के लिए श्रम कानूनों का सहारा लेने तथा श्रम न्यायालय का रुख करने का रास्ता मिला.
संविधान पीठ इन सवालों पर करेगी फैसला
नौ जजों की संविधान पीठ के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि करीब पांच दशक पहले तय की गई उद्योग की व्यापक कसौटी आज की परिस्थितियों में भी लागू रहनी चाहिए या उसमें बदलाव जरूरी है. अदालत को यह भी तय करना है कि किसी संस्था या उपक्रम को उद्योग मानने के लिए कौन से स्पष्ट और व्यावहारिक मानदंड अपनाए जाएं.
पीठ 1982 में किए गए संबंधित कानूनी संशोधनों के साथ औद्योगिक संबंध संहिता 2020 के प्रभाव पर भी विचार कर रही है. इसी के आधार पर यह महत्वपूर्ण सवाल तय होगा कि सरकारी विभागों और समाज कल्याण से जुड़ी योजनाओं को औद्योगिक गतिविधियों की श्रेणी से बाहर रखा जा सकता है या नहीं.
नए श्रम कानून के बाद भी पुराने मामलों पर पड़ेगा असर
औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 की जगह लेने वाली औद्योगिक संबंध संहिता 2020 को 21 नवंबर 2025 से लागू किया जा चुका है. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का एक अहम पहलू यह भी होगा कि नई संहिता लागू होने के बाद उद्योग की पुरानी न्यायिक व्याख्याओं की कानूनी स्थिति क्या रहेगी.
संविधान पीठ पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि उसका फैसला पुराने कानून के तहत अदालतों में लंबित और चल रहे मामलों पर भी लागू होगा. इसलिए इस निर्णय का असर बड़ी संख्या में कर्मचारियों के श्रम अधिकारों, सेवा शर्तों और कानूनी उपचार के विकल्पों पर पड़ सकता है.
फैसले के बाद यह तस्वीर अधिक स्पष्ट होगी कि किन संस्थानों और गतिविधियों को उद्योग की श्रेणी में माना जाएगा और उनके कर्मचारियों को औद्योगिक विवाद से जुड़े कानूनों के तहत कौन से अधिकार हासिल होंगे. सुप्रीम कोर्ट का आज का निर्णय इसी लंबे समय से चले आ रहे कानूनी विवाद की दिशा तय करेगा.