मध्य प्रदेश में एथेनॉल प्लांट के लिए भेजे गए सरकारी चावल की कथित हेराफेरी का मामला सामने आने के बाद यह बहस केवल एक संभावित घोटाले तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि सरकारी निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर भी सवाल खड़े कर रही है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इसे कथित 1,200 करोड़ रुपये का घोटाला बताते हुए भाजपा सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। विपक्ष का दावा है कि लाखों मीट्रिक टन सरकारी चावल का दुरुपयोग सरकारी तंत्र की मिलीभगत से हुआ। दूसरी ओर, मामले की जांच जारी है और सरकार की विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार है।

सरकार की नाक नीचे चल रहा करोड़ों का खेल
प्रारंभिक जांच के अनुसार, एफसीआई से जारी चावल की खेप छिंदवाड़ा स्थित एथेनॉल प्लांट के लिए रवाना हुई, लेकिन ट्रक बालाघाट की एक निजी राइस मिल में मिला। पुलिस ने 242.55 क्विंटल चावल के 490 बोरे जब्त किए हैं। एफआईआर में आशंका जताई गई है कि सरकारी चावल की जगह सस्ता टूटा चावल उपयोग करने की योजना बनाई गई थी। मामले की जांच के लिए एसआईटी गठित की गई है।
इसी दौरान उत्तर प्रदेश के मथुरा स्थित एक डिस्टिलरी में भी रियायती दर पर मिले सरकारी चावल के कथित दुरुपयोग का मामला सामने आया। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, एथेनॉल उत्पादन के लिए आवंटित चावल खुले बाजार में अधिक कीमत पर बेचा जा रहा था। जांच समिति ने कंपनी प्रबंधन के साथ कुछ अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं। यदि दोनों मामलों में जांच के दौरान आरोप सही साबित होते हैं, तो यह केवल अलग-अलग घटनाएं नहीं, बल्कि निगरानी प्रणाली की कमजोरियों का संकेत मानी जाएंगी।

राजनीतिक आरोपों से अधिक जरूरी है निष्पक्ष जांच
जिस एथेनॉल को देश के ईंधन क्षेत्र का ब्रह्मास्त्र बताकर जनता के सामने प्रस्तुत किया गया, उसी के प्लांट में जाने वाले सरकारी चावल से जुड़े इतने बड़े कथित घोटाले के सामने आने के बाद सरकार पर जनता का भरोसा कैसे कायम रहेगा? एक तरफ एथेनॉल प्लांट्स को लेकर प्रदूषण संबंधी चिंताएं लगातार सामने आती रही हैं, वहीं दूसरी तरफ इस कथित घोटाले ने सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली पर भी बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
सरकार की नाक के नीचे इतने बड़े कथित घोटाले का सामने आना यही संकेत देता है कि या तो सरकारी योजनाओं की मॉनिटरिंग प्रभावी नहीं है, या फिर घोटाले में शामिल लोगों ने व्यवस्था की कमियों का फायदा उठाने का तरीका खोज लिया है।

एक तरफ मौजूदा सरकार एथेनॉल को लेकर बड़े-बड़े दावे और बयान देती है, वहीं दूसरी तरफ सरकारी तंत्र की निगरानी में इतनी बड़ी कथित अनियमितता सामने आती है। भले ही सरकार और प्रशासन इस मामले में कार्रवाई करें, लेकिन सवाल यही उठता है कि अपने ही विभागों में हो रही ऐसी गड़बड़ियों की रोकथाम में सरकारी व्यवस्था बार-बार क्यों विफल दिखाई दे रही है?
हाल के दिनों में परीक्षाओं में हुई अनियमितताओं को संभालने में भी सरकारी तंत्र को कड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। ऐसे में अब एथेनॉल से जुड़े इस कथित मामले ने भी सरकारी निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं।