Jharkhand News: झारखंड की जेलें अब केवल सजा काटने की जगह नहीं रह गई हैं, बल्कि सुधार और आत्मनिर्भरता की नई मिसाल बन रही हैं. सोहराय पेंटिंग और खादी वस्त्रों के बाद अब जेलों में बंद महिला कैदियां आर्टिफिशियल यानी कृत्रिम गजरे तैयार कर रही हैं, जिनकी सुंदरता और बेहतरीन फिनिशिंग ने सभी का ध्यान खींचा है.
इन गजरों की खास बात यह है कि ये देखने में बिल्कुल असली फूलों जैसे लगते हैं. पहली नजर में यह पहचान पाना मुश्किल हो जाता है कि ये असली फूलों से बने हैं या कृत्रिम सामग्री से. इन्हें बहुत ही बारीकी और सफाई से तैयार किया जाता है, जिससे इनकी चमक और बनावट लंबे समय तक बनी रहती है.
इत्र छिड़ककर लंबे समय तक खुशबू का आनंद
जहां ताजे फूलों के गजरे कुछ ही घंटों में मुरझा जाते हैं, वहीं जेल में बने ये कृत्रिम गजरे कभी खराब नहीं होते. इन्हें बार-बार इस्तेमाल किया जा सकता है. साथ ही इन पर अपनी पसंद का इत्र छिड़ककर लंबे समय तक खुशबू का आनंद लिया जा सकता है. यही वजह है कि इनकी मांग धीरे-धीरे बढ़ती जा रही है.
जेल प्रशासन इन उत्पादों को बड़े बाजार तक पहुंचाने की तैयारी कर रहा है. खासकर मुंबई जैसे शहरों में, जहां फैशन, शादी-ब्याह और फिल्मों में गजरों का काफी चलन है, वहां इन गजरों के लिए अच्छा बाजार मिलने की उम्मीद है. प्रशासन का मानना है कि अगर सही मंच और बाजार मिला तो ये उत्पाद महिला कैदियों के लिए रोजगार और आत्मनिर्भरता का मजबूत जरिया बन सकते हैं.
इस पहल से न केवल महिला कैदियों को नया हुनर सीखने का मौका मिल रहा है, बल्कि उन्हें आत्मविश्वास और नई शुरुआत की उम्मीद भी मिल रही है. झारखंड की जेलें अब सुधार, प्रशिक्षण और स्वावलंबन का केंद्र बनती नजर आ रही हैं.