Ranchi News: राजधानी रांची में टीबी के खिलाफ चल रहे सरकारी अभियानों के बावजूद हालात पूरी तरह काबू में नहीं आ पाए हैं. बीते 12 महीनों के आंकड़े बताते हैं कि हर दस में से एक मरीज इलाज के दौरान जिंदगी की जंग हार गया. जिले में टीबी उन्मूलन की दिशा में प्रयास तो जारी हैं, लेकिन असमान व्यवस्था और सामाजिक सहयोग की कमी इलाज की सफलता पर असर डाल रही है.
सफलता दर अब भी अधूरी
जिला स्वास्थ्य समिति और जिला टीबी केंद्र की रिपोर्ट के अनुसार जिले में इलाज की कुल सफलता दर 89 प्रतिशत दर्ज की गई है. इस अवधि में 155 टीबी मरीजों की मौत हो चुकी है. अलग-अलग प्रखंडों में इलाज के नतीजे एक जैसे नहीं हैं, जिससे व्यवस्था की कमजोर कड़ियां सामने आई हैं.
नामकुम सबसे कमजोर कड़ी
नामकुम प्रखंड की स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक पाई गई है, जहां इलाज की सफलता दर केवल 71 प्रतिशत रही. यहां कुल 752 मरीज इलाज पर हैं. इनमें से 639 को इलाज और पोषण सहायता मिली है, जबकि 46 मरीज इससे दूर हैं. इस दूरी का सीधा असर उनके स्वास्थ्य और इलाज की निरंतरता पर पड़ रहा है.
सिर्फ दवा से नहीं होगा इलाज
डाक्टरों का कहना है कि टीबी को केवल दवाओं से खत्म नहीं किया जा सकता. इलाज के साथ पोषण, नियमित काउंसलिंग और सामाजिक सहयोग जरूरी है. विशेषज्ञों के अनुसार इलाज बीच में छोड़ने और सहमति प्रक्रिया में देरी से दवा प्रतिरोधी टीबी का खतरा भी बढ़ रहा है.
सरकारी और निजी इलाज में फर्क
जिला टीबी केंद्र के अनुसार पब्लिक हेल्थ सिस्टम में इलाज की सफलता दर 87 प्रतिशत है, जबकि प्राइवेट सेक्टर में यह 92 प्रतिशत दर्ज की गई है. हालांकि मरीजों का सबसे बड़ा बोझ सरकारी व्यवस्था पर ही है. सिविल सर्जन डा. प्रभात कुमार का कहना है कि निजी क्षेत्र में सीमित मरीज, बेहतर फालोअप और आर्थिक क्षमता इसके कारण हैं.
निक्षय मित्र योजना के तहत जिले में 4569 मरीज इलाज पर हैं. इनमें से 3317 ने सहमति दी है, जबकि 549 की सहमति अब भी लंबित है. सहमति नहीं होने से इन मरीजों को पोषण किट और सामाजिक सहयोग नहीं मिल पा रहा है, जिससे इलाज प्रभावित हो रहा है.
पोषण किट वितरण में असमानता
अब तक जिले में 6073 पोषण किट वितरित किए गए हैं. नामकुम में 2105 किट दिए गए, जबकि रातू में 53, लापुंग में 32 और बुढ़मू में 55 किट ही पहुंच पाए. यह अंतर भी इलाज की सफलता को प्रभावित कर रहा है.
आने वाले साल की रणनीति
जिला स्वास्थ्य समिति ने 2026 के लिए नई रणनीति तैयार की है. इसमें कमजोर प्रखंडों पर विशेष फोकस, सहमति लंबित मरीजों को योजना से जोड़ना, हाई रिस्क क्षेत्रों में सक्रिय खोज अभियान और इलाज छोड़ने वालों की सख्त निगरानी शामिल है.
टीबी से बचाव के उपाय
लगातार खांसी, बुखार, वजन कम होना और रात में पसीना आने जैसे लक्षण दिखें तो तुरंत जांच कराएं. खांसते समय मुंह ढकें, इलाज पूरा करें, पोषण पर ध्यान दें, घर में हवा और रोशनी का इंतजाम रखें, बीसीजी टीका लगवाएं और नशे से दूरी बनाए रखें.
रांची में टीबी के खिलाफ जंग सिर्फ मेडिकल नहीं बल्कि सामाजिक चुनौती भी बन चुकी है. जब तक दवा, पोषण और सहयोग तीनों का समन्वय नहीं होगा, तब तक शत प्रतिशत सफलता हासिल करना मुश्किल रहेगा. आंकड़े साफ संकेत देते हैं कि व्यवस्था में सुधार और समुदाय की भागीदारी अब अनिवार्य हो चुकी है.