Jharkhand News: राज्य में फार्मेसी की पढ़ाई और फार्मासिस्टों के संरक्षण के लिए गठित झारखंड राज्य फार्मेसी काउंसिल इन दिनों विवादों में है. काउंसिल के लिए सरकार द्वारा किए गए मनोनयन को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं. मीडिया रिपोर्ट्स में बताया जा रहा है कि जिन पांच सदस्यों को सरकार की ओर से मनोनीत किया गया है, उनके चयन में अनियमितता और भ्रष्टाचार हुआ है. काउंसिल के गठन में छह निर्वाचित और पांच मनोनीत सदस्य होते हैं और मनोनयन की प्रक्रिया मंत्री के अनुमोदन के बाद पूरी की जाती है. आरोप है कि मनोनयन में गड़बड़ी की जानकारी विभाग को उपलब्ध कराई गई, इसके बावजूद अब तक किसी तरह की कार्रवाई नहीं हुई है.
आदिवासी प्रतिनिधित्व नहीं मिलने पर नाराजगी
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार सरकार ने काउंसिल के लिए जिन पांच लोगों का मनोनयन किया है, उनमें एक भी सदस्य आदिवासी समाज से नहीं है. जबकि एसटी समुदाय से जुड़े कई लोगों ने सदस्य बनने के लिए विभाग में आवेदन देकर अपनी इच्छा जाहिर की थी. इसके बावजूद किसी को अवसर नहीं दिया गया. जिन लोगों को मनोनीत किया गया है उनमें विनय कुमार महतो, धर्मेंद्र सिंह, विमलेश कुमार दुबे, नैयर आजमी और आलिया खान शामिल हैं. रिपोर्ट्स में यह भी कहा जा रहा है कि विनय कुमार महतो को छोड़कर अन्य सदस्य झारखंड के मूलवासी नहीं हैं और उनका संबंध दूसरे राज्यों से है.
गैर-सरकारी सदस्य और अध्यक्ष को लेकर उठे सवाल
मीडिया रिपोर्ट्स में यह भी बताया जा रहा है कि मनोनीत सभी सदस्य गैर सरकारी पदों पर हैं. सबसे बड़ा सवाल उस समय खड़ा हुआ जब विमलेश कुमार दुबे को सदस्य बनाए जाने के बाद काउंसिल का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया गया. रिपोर्ट्स के मुताबिक विमलेश कुमार दुबे फार्मासिस्ट नहीं हैं, इसके बावजूद उन्हें यह जिम्मेदारी दी गई. इसे लेकर तुलना की जा रही है कि जैसे किसी बार काउंसिल का अध्यक्ष बिना वकालत की डिग्री के नियुक्त कर दिया जाए.
मंत्री के अनुमोदन पर भी उठे सवाल
क्योंकि झारखंड राज्य फार्मेसी काउंसिल का गठन मंत्री के अनुमोदन के बाद होता है, ऐसे में मीडिया रिपोर्ट्स में मंत्री इरफान अंसारी की भूमिका पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं. यह चर्चा हो रही है कि क्या मनोनयन के दौरान जरूरी मानकों को नजरअंदाज किया गया या फिर सब कुछ जानबूझ कर किया गया.
आरोपों की निष्पक्ष जांच जरुर
मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर देखें तो झारखंड राज्य फार्मेसी काउंसिल के मनोनयन ने पारदर्शिता, योग्यता और आदिवासी प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है. यदि इन आरोपों की निष्पक्ष जांच होती है तो इससे न सिर्फ काउंसिल की कार्यप्रणाली बल्कि सरकार की जवाबदेही पर भी स्थिति साफ हो सकेगी.