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  • 2026-03-19

Sewer Death: पिछले 9 साल में सीवर सफाई में 622 मौतें, 52 परिवारों को अब तक नहीं मिला मुआवजा

Sewer Death: पिछले 9 सालों में पूरे देश में सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान 622 सफाईकर्मियों की जान चली गई।  यह जानकारी मंगलवार सरकार ने  लोकसभा में दी।

539 को पूरा, 25 आधा, 52 परिवार अब भी खाली हाथ और 6 मामले बंद
इनमें से 539 परिवारों को पूरा मुआवजा मिला, 25 परिवारों को आधा, और 52 परिवार ऐसे हैं जिन्हें आज तक एक भी पैसा नहीं मिला। 6 मामलों को बिना किसी समाधान के ही बंद कर दिया गया।
सबसे ज्यादा मौतें उत्तर प्रदेश में हुई, जहां 86 लोगों की जान गई। इसके बाद महाराष्ट्र (82), तमिलनाडु (77), हरियाणा (76), गुजरात (73) और दिल्ली (62) सफाईकर्मियों की जान चली गई।

यूपी में हालात सबसे खराब, कई परिवारों को मदद नहीं, 
सबसे खराब हाल उत्तर प्रदेश का है, जहां कई परिवारों को अब तक मुआवजा नहीं मिला। दिल्ली, महाराष्ट्र और गुजरात में भी कई परिवारों को कोई मदद नहीं दी गई।

सरकार का दावा- अब मैनुअल स्कैवेंजिंग खत्म
सरकार ने  कहा कि 2023 के सर्वे में देश में एक भी मैनुअल स्कैवेंजर नहीं मिला। लेकिन इससे पहले 2013 और 2018 के सर्वे में 58 हजार से ज्यादा लोग इस काम में लगे हुए पाए गए थे। इन लोगों को 40 हजार रुपये की मदद दी गई, कुछ को ट्रेनिंग मिली और कुछ को खुद का काम शुरू करने के लिए लोन और सब्सिडी दी गई।

"नमस्ते योजना" की शुरुआत 
सरकार ने “नमस्ते योजना” शुरू की है, ताकि सीवर की सफाई मशीनों से हो और लोगों को इस खतरनाक काम से छुटकारा मिल सके। इसके तहत सफाईकर्मियों को ट्रेनिंग, पैसे और सेफ्टी के सामान दिए जाते हैं।
अब तक देश में करीब 89 हजार सफाईकर्मियों की पहचान की गई है, जिनमें सबसे ज्यादा लोग उत्तर प्रदेश में हैं। अच्छी बात ये है कि इनमें से ज्यादातर लोगों को आयुष्मान भारत जैसी स्वास्थ्य योजनाओं से जोड़ा गया है।
सरकार के पास ये जानकारी नहीं है कि मशीन से काम करने के बाद सफाईकर्मियों की आमदनी कितनी बढ़ी या उनका काम कितना आसान हुआ।

842 शिकायतें आई, सैलरी और सुरक्षा की परेशानी, सरकार बोली- ये काम राज्यों का है
2025 में सफाई कर्मचारियों से जुड़ी 842 शिकायतें सामने आईं, जिनमें सैलरी न मिलना, सुरक्षा उपकरण न मिलना और भेदभाव जैसे मुद्दे शामिल हैं।
सरकार का कहना है कि इन मामलों में कार्रवाई की जिम्मेदारी राज्यों की होती है, इसलिए इसका पूरा डेटा केंद्र सरकार के पास नहीं रहता।
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