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  • 2026-01-04

Jharkhand Politics: पेसा नियमावली को लेकर अर्जुन मुंडा ने सरकार पर साधा निशाना, बोले मूल आत्मा की कर दी निर्मम हत्या

Jharkhand Politics: पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने पेसा एक्ट 1996 की नियमावली को लेकर राज्य सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं. उन्होंने कहा कि सरकार ने पेसा एक्ट की मूल आत्मा की नियमावली में निर्मम तरीके से हत्या कर दी है. अर्जुन मुंडा का कहना है कि मूल पेसा एक्ट में ग्राम सभा की अवधारणा को रुढिजन्य विधि परंपरा से जोड़ा गया है, लेकिन झारखंड सरकार की ओर से बनाई गई नियमावली में इसे जानबूझकर शामिल नहीं किया गया है.

पेसा नियमावली के अभिप्रेत में रुढिजन्य विधि परंपरा का उल्लेख नहीं
अर्जुन मुंडा ने सवाल उठाया कि किसी भी नियम या कानून का एक अभिप्रेत यानी प्रिएंबल होता है, जिसमें उसकी मूल भावना स्पष्ट की जाती है. लेकिन पेसा नियमावली के अभिप्रेत में रुढिजन्य विधि परंपरा का उल्लेख नहीं होना जनजातीय समाज के साथ सीधा खिलवाड़ है. उन्होंने कहा कि इससे संस्थाओं और प्रशासन के बीच संतुलन बिगड़ेगा और दोनों अपने अपने तरीके से काम करने लगेंगे, जिसका सीधा असर संस्थागत विकास पर पड़ेगा और यह व्यवस्था धीरे धीरे धरासायी हो जाएगी.

राज्य सरकार ने नियमावली बनाने में न सिर्फ अनावश्यक देरी की
प्रदेश भाजपा मुख्यालय में मीडिया से बातचीत के दौरान अर्जुन मुंडा ने यह भी कहा कि राज्य सरकार ने नियमावली बनाने में न सिर्फ अनावश्यक देरी की, बल्कि इसे सही तरीके से तैयार भी नहीं किया. उन्होंने आरोप लगाया कि यह देरी जानबूझकर की गई ताकि शिड्यूल एरिया के मूल चरित्र को कमजोर करने की रणनीति तैयार की जा सके. नियमावली में बाद में मानकी, मुंडा, डोकलो और सोहोर जैसे ग्राम प्रधानों का जिक्र तो किया गया, लेकिन इसे इस तरह कमजोर कर दिया गया है कि आने वाले समय में इसका जनजातीय समाज के संस्थागत ढांचे पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा.

अर्जुन मुंडा ने कहा कि वर्तमान नियमावली से किसे लाभ और किसे नुकसान होगा, इस पर चर्चा से पहले सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि पेसा एक्ट की मूल भावना यानी रुढिजन्य विधि परंपरा को नियमावली में क्यों शामिल नहीं किया गया. उन्होंने कहा कि सरकार का पक्ष सामने आने के बाद ही भाजपा अपनी आगे की रणनीति और रुख स्पष्ट करेगी.

सरकार का स्पष्ट जवाब देना जरुरी
पेसा नियमावली को लेकर अर्जुन मुंडा का बयान इस मुद्दे को एक बार फिर राजनीतिक और संवैधानिक बहस के केंद्र में ले आता है. उनका जोर इस बात पर है कि नियमावली में देरी और उसमें किए गए बदलाव केवल तकनीकी नहीं, बल्कि जनजातीय स्वशासन की मूल अवधारणा को प्रभावित करने वाले हैं. यदि सरकार इस पर स्पष्ट जवाब नहीं देती है, तो यह मामला आने वाले समय में आदिवासी अधिकार और शिड्यूल एरिया की स्वायत्तता से जुड़ा बड़ा विवाद बन सकता है.
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