Jharkhand News: पेसा कानून की नियमावली को लेकर लंबे समय से चल रहा विवाद एक बार फिर हाईकोर्ट के सामने आया. सरकार की ओर से अब तक स्थिति स्पष्ट न होने पर अदालत ने सख्त संकेत दिए हैं और अगली सुनवाई तक जवाब तलब किया है.
पंचायती राज विभाग के सचिव मनोज कुमार सशरीर अदालत में हुए उपस्थित
पेसा कानून से जुड़ी नियमावली लागू नहीं होने के मामले में दायर अवमानना याचिका पर झारखंड हाईकोर्ट में गुरुवार को सुनवाई हुई. सुनवाई के दौरान पंचायती राज विभाग के सचिव मनोज कुमार सशरीर अदालत में उपस्थित हुए.
सचिव की ओर से स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया
खंडपीठ ने सचिव से सीधा सवाल किया कि पेसा कानून से संबंधित नियमावली को अब तक कैबिनेट के समक्ष प्रस्तुत किया गया है या नहीं. इस पर सचिव की ओर से स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया और जानकारी देने के लिए मंगलवार तक का समय मांगा गया. अदालत ने इस आग्रह को स्वीकार कर लिया.
हाईकोर्ट ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि अगली तारीख तक इस संबंध में ठोस जानकारी नहीं दी गई तो अदालत कड़ा रुख अपनाएगी. इसके साथ ही पिछली सुनवाई में बालू घाट की नीलामी के बाद अलॉटमेंट पर लगाई गई रोक को अगली सुनवाई तक के लिए बरकरार रखा गया है. यह अवमानना याचिका आदिवासी बुद्धिजीवी मंच की ओर से दायर की गई है. मामले की सुनवाई हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस तरलोक सिंह चौहान और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने की. प्रार्थियों की ओर से वरीय अधिवक्ता अजीत कुमार ने अदालत में पक्ष रखा.
अदालत अब और देरी के पक्ष में नहीं
पेसा कानून आदिवासी क्षेत्रों में स्वशासन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण कानून है, लेकिन नियमावली के अभाव में इसका प्रभावी क्रियान्वयन अब तक नहीं हो सका है. हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी यह संकेत देती है कि अदालत अब और देरी के पक्ष में नहीं है. सरकार के लिए यह मामला केवल कानूनी नहीं बल्कि संवैधानिक जिम्मेदारी से भी जुड़ा है. अगली सुनवाई में यदि स्पष्ट जवाब नहीं आया तो इसका असर प्रशासनिक फैसलों और खनन गतिविधियों पर और गहरा पड़ सकता है.