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  • 2026-05-10

Jharkhand News: झारखंड शराब घोटाला मामले में एक साल बाद भी एसीबी की जांच बेनतीजा, चार्जशीट में देरी से सभी 17 आरोपियों को मिली “डिफाल्ट बेल”

Jharkhand News: झारखंड के भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) में दर्ज बहुचर्चित शराब घोटाला केस के 20 मई को एक साल पूरे होने वाले हैं, लेकिन जांच अब तक किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सकी है. चौंकाने वाली बात यह है कि इस अवधि में निलंबित आईएएस विनय कुमार चौबे सहित 17 रसूखदार अधिकारियों और कारोबारियों को गिरफ्तार तो किया गया, लेकिन समय पर चार्जशीट दाखिल नहीं होने के कारण एक-एक कर सभी को “डिफाल्ट बेल” का लाभ मिल गया. एसीबी अधिकारियों ने स्वीकार किया कि तैयारी अधूरी रहने के चलते वे समय पर आरोप पत्र दाखिल नहीं कर सके.

भ्रष्टाचार के पुख्ता सबूतों के दावे के बावजूद जांच अटकी
प्राथमिकी दर्ज होने के साथ ही एसीबी ने आईएएस विनय कुमार चौबे, संयुक्त आयुक्त गजेंद्र सिंह और प्लेसमेंट एजेंसी के नीरज कुमार को गिरफ्तार कर जेल भेजा था, जिसके बाद 14 अन्य गिरफ्तारियां हुईं. कोर्ट में पेशी के दौरान एसीबी ने भ्रष्टाचार के पुख्ता सबूत होने का दावा किया था, जिसके आधार पर आरोपियों को न्यायिक हिरासत मिली. हालांकि, जांच में बरती गई शिथिलता के कारण सभी आरोपी जेल से बाहर आ गए हैं, जबकि विनय कुमार चौबे फिलहाल एक अन्य मामले में जेल में बंद हैं.

फर्जी बैंक गारंटी और 750 करोड़ तक पहुंचा घोटाले का आंकड़ा
यह पूरा मामला 2022 की उत्पाद नीति में फर्जी बैंक गारंटी के आधार पर चहेती प्लेसमेंट एजेंसियों को मैनपावर आपूर्ति का ठेका देने से जुड़ा है. जांच में दावा किया गया था कि झारखंड की नई उत्पाद नीति छत्तीसगढ़ के शराब सिंडिकेट के साथ मिलकर तैयार की गई थी, जिससे सरकारी खजाने को भारी नुकसान पहुंचा. शुरुआत में 38 करोड़ का बताया गया यह घोटाला अब बढ़कर 750 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है, जिसमें निजी कंपनियों को अनुचित लाभ पहुंचाने के गंभीर आरोप हैं.

जेल से बाहर आए सिंडिकेट के बड़े नाम
इस केस में गिरफ्तार किए गए जेएसबीसीएल के महाप्रबंधक सुधीर कुमार दास, पूर्व आयुक्त अमित प्रकाश और छत्तीसगढ़ के शराब कारोबारी अतुल सिंह व मुकेश मनचंदा सहित अन्य सभी आरोपी अब जेल से बाहर हैं. एसीबी का दावा था कि इन अधिकारियों और शराब कारोबारियों ने मिलकर सरकारी नियमों को ताक पर रखा था. अब एक साल बीतने के बावजूद चार्जशीट का इंतजार है, जिससे एसीबी की कार्यप्रणाली और जांच की गंभीरता पर सवाल खड़े हो रहे हैं.
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