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  • 2025-12-04

Jharkhand News: कोचिंग सेंटर नियंत्रण और विश्वविद्यालय विधेयक राज्यपाल ने सरकार को लौटाए, आपत्तियों के निपटारे के बाद ही फिर भेजने का निर्देश

Jharkhand News: राज्यपाल ने कोचिंग सेंटर नियंत्रण और विनियमन विधेयक 2025 और राज्य विश्वविद्यालय विधेयक 2025 को सरकार को वापस भेज दिया है. लोकभवन (पहले राजभवन) ने कहा है कि दोनों विधेयकों पर राजनीतिक और गैर राजनीतिक संगठनों द्वारा उठाई गई आपत्तियों का निपटारा करने के बाद ही इन्हें दोबारा भेजा जाए. फिलहाल दोनों विधेयक उच्च शिक्षा विभाग के पास विचाराधीन हैं.

राज्य सरकार ने विधानसभा के मानसून सत्र में शिक्षा से जुड़े ये दो महत्वपूर्ण विधेयक पारित किए थे. इन्हें मंजूरी के लिए राज्यपाल के पास भेजा गया था. विश्वविद्यालय विधेयक 2025 में कुलपति नियुक्ति के मामले में राज्यपाल की भूमिका समाप्त करने का प्रावधान है. इसी को लेकर कई संगठनों ने विरोध जताया था. विपक्षी दलों ने इसे राज्यपाल के अधिकारों में हस्तक्षेप बताया था और कहा था कि इससे विश्वविद्यालयों पर सरकार का पूर्ण नियंत्रण हो जाएगा. कुछ छात्र संगठनों ने भी ज्ञापन देकर इस विधेयक को छात्रों के अधिकारों के खिलाफ बताया था.

कोचिंग संस्थान नियंत्रण और विनियमन विधेयक 2025 में 50 से अधिक छात्रों वाले संस्थानों के लिए रजिस्ट्रेशन और बैंक गारंटी की बाध्यता का प्रावधान है. साथ ही जिला और राज्य स्तर पर रेगुलेटरी कमेटी बनाने और 1000 से अधिक छात्रों वाले कोचिंग सेंटर में मनो चिकित्सक नियुक्त करने की अनिवार्यता भी शामिल की गई है. कोचिंग संचालकों और अन्य संबंधित पक्षों ने इन प्रावधानों का विरोध करते हुए कहा है कि बैंक गारंटी से छात्रों पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा क्योंकि इसकी भरपाई अंततः फीस में ही होगी.

इन आपत्तियों को ध्यान में रखते हुए लोकभवन ने दोनों विधेयकों को सरकार को लौटा दिया है. ऐसे में इनके कानून बनने की प्रक्रिया में देरी तय है.

शिक्षा क्षेत्र में बड़े सुधारों की घोषणा भले ही मंशा के स्तर पर मजबूत लगती हो, लेकिन जमीनी स्तर पर इनसे जुड़ी जटिलताएं लगातार सामने आ रही हैं. विश्वविद्यालय विधेयक में कुलपति नियुक्ति से जुड़े विवादों ने प्रशासनिक स्वतंत्रता और राजनीतिक दखल के बीच संतुलन के प्रश्न को फिर उभार दिया है. वहीं कोचिंग संस्थानों से जुड़ी सख्त शर्तें गुणवत्ता सुधार की दिशा में कदम हैं, लेकिन इनके आर्थिक प्रभाव को लेकर गंभीर सवाल बने हुए हैं. दोनों विधेयकों का वापस लौटना यह संकेत है कि व्यापक सहमति और स्पष्ट नीतिगत ढांचा तैयार किए बिना शिक्षा सुधार आगे नहीं बढ़ पाएंगे.
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