अपने जारी बयान में सरयू राय ने स्पष्ट किया कि वह उच्च न्यायालय इसलिए गए थे क्योंकि तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता ने उनके खिलाफ गिरफ्तारी की पूरी तैयारी कर ली थी। राय ने कहा कि उन्होंने विभागीय दस्तावेजों के आधार पर मंत्री बन्ना गुप्ता के भ्रष्टाचार का खुलासा किया था, जिसके बाद सरकार की ओर से उन्हें दबाव में लेने की कोशिशें की गईं। इस दौरान न्यायालय ने उन्हें पीड़क कार्रवाई से सुरक्षा प्रदान की और बाद में उन्हें इस मामले में जमानत भी मिल गई। उन्होंने कहा कि जब गिरफ्तारी का खतरा टल चुका था, तब न्यायालय द्वारा पूर्व का आदेश वापस लिया जाना मात्र औपचारिक प्रक्रिया थी, जिसका कोई प्रतिकूल प्रभाव उन पर नहीं पड़ा।
सरयू राय ने मामले की पृष्ठभूमि बताते हुए कहा कि कोविड महामारी के दौरान स्वास्थ्य विभाग में कार्यरत कर्मचारियों को सरकार ने एक महीने के वेतन के बराबर प्रोत्साहन राशि देने का निर्णय लिया था। लेकिन स्वास्थ्य मंत्री के रूप में बन्ना गुप्ता ने स्वयं प्रोत्साहन राशि लेने के लिए अपना बिल बनवाकर कोषागार भेज दिया। इतना ही नहीं, अपने आप्त सचिव, कोषांग के कर्मियों और अन्य लोगों सहित कुल 60 व्यक्तियों का नाम प्रोत्साहन राशि के लिए भेजा गया, जो स्पष्ट रूप से भ्रष्ट आचरण का उदाहरण है।
उन्होंने कहा कि जब उन्होंने स्वास्थ्य विभाग के दस्तावेजों के आधार पर इस भ्रष्टाचार का पर्दाफाश किया, तो मंत्री द्वारा उनके विरुद्ध एफआईआर करा दी गई, जिसमें आरोप लगाया गया कि उन्होंने विभागीय कागजात चोरी किए हैं। सरयू राय ने कहा कि यह मुकदमा बन्ना गुप्ता के दबाव में दर्ज कराया गया और इसका उद्देश्य उन्हें भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने से रोकना था।
राय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “जो भ्रष्टाचार करे उसे छूट, और जो भ्रष्टाचार उजागर करे उस पर मुकदमा—यही अब तक की व्यवस्था दिख रही है। लेकिन इससे मैं हतोत्साहित नहीं होने वाला। भ्रष्टाचार के खिलाफ मेरा आंदोलन पूर्ववत जारी रहेगा।”
उन्होंने कहा कि जनता ने उन्हें भ्रष्टाचार के मुद्दों को उठाने की जिम्मेदारी दी है, और वह बिना किसी दबाव के अपनी लड़ाई जारी रखेंगे।