Jharkhand News: पलामू में पर्यावरण संरक्षण को लेकर वन विभाग ने एक अनोखी पहल की है. लगातार घटते जंगल और बिगड़ते पर्यावरण संतुलन को देखते हुए विभाग ने फैसला किया है कि जो भी व्यक्ति वन विभाग की जमीन पर पौधा लगाएगा, वह उस पेड़ का मालिक माना जाएगा. पेड़ से मिलने वाली उपज और अन्य वनोपज का आर्थिक लाभ भी उसी व्यक्ति को मिलेगा.
इस पहल का मुख्य उद्देश्य जंगल के क्षेत्रफल को बढ़ाना है. वन विभाग ने लोगों से अपील की है कि वे जन्मदिन, शादी की सालगिरह, बरसी, पूर्वजों की याद या किसी भी खास मौके पर पौधा लगाएं. पौधे की देखभाल संबंधित व्यक्ति और विभाग मिलकर करेंगे. विभाग जमीन उपलब्ध करा रहा है ताकि अधिक से अधिक लोग पर्यावरण बचाने के इस अभियान से जुड़ सकें.
वन विभाग ग्रामीणों को भावनात्मक रूप से जोड़ने की कोशिश कर रहा है. वन समितियां गांवों में बैठक कर लोगों को वनोपज से होने वाले आर्थिक लाभ के बारे में बता रही हैं. ग्रामीणों को आम, इमली, कटहल, महुआ और अमरूद जैसे फलदार पेड़ों के फायदे बताए जा रहे हैं, जो सीधे आर्थिक आमदनी देते हैं और पर्यावरण को भी सुरक्षित रखते हैं.
पलामू में इस समय 1158.54 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में जंगल फैला है. 2023 की फॉरेस्ट सर्वे रिपोर्ट में बताया गया कि इस इलाके में 2.36 वर्ग किलोमीटर जंगल बढ़ा है, हालांकि कुल डेंसिटी में कमी दर्ज की गई. यहां 560 वर्ग किलोमीटर में खुला जंगल है जबकि 65.50 वर्ग किलोमीटर ही घना जंगल है. डेंसिटी बढ़ाने के लिए वन विभाग ने बड़ी योजना बनाई है और आने वाले वर्षों में वन क्षेत्र में 100000 इमली के पेड़ लगाने का लक्ष्य तय किया है. ग्रामीणों को स्थानीय स्तर पर फलदार पौधे उपलब्ध कराए जाएंगे. पौधा लगाने वाला व्यक्ति पेड़ का नाम भी अपनी इच्छा से रख सकता है.
वन विभाग का कहना है कि यह पहल लोगों को प्रकृति से जोड़ने की दिशा में एक प्रभावी कदम है. पौधा लगाने वाले व्यक्ति को पेड़ का मालिकाना हक और उपज का लाभ मिलना लोगों में उत्साह बढ़ा रहा है. विभाग का प्रयास है कि गांव के लोग इस अभियान को अपने जीवन से जोड़ें और आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहतर पर्यावरण तैयार करें.
पलामू वन विभाग की यह पहल न सिर्फ पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देती है बल्कि स्थानीय लोगों को आर्थिक रूप से भी जोड़ती है. पेड़ की उपज का मालिकाना हक मिलने से ग्रामीणों की भागीदारी स्वतः बढ़ेगी. पेड़ को व्यक्तिगत महत्व देने की यह रणनीति लोगों को दीर्घकालिक रूप से अभियान से जोड़ने में प्रभावी हो सकती है. साथ ही डेंसिटी में आई कमी को देखते हुए यह मॉडल आने वाले वर्षों में पलामू के जंगलों को फिर से मजबूत बनाने में मददगार सिद्ध हो सकता है.