Jharkhand News: झारखंड हाईकोर्ट ने सहायक आचार्य गणित और विज्ञान भर्ती में जारी संशोधित परिणाम पर गंभीर सवाल उठाए हैं. कोर्ट ने झारखंड कर्मचारी चयन आयोग से पूछा है कि किस नियम के आधार पर अधिक अंक पाने वाले अभ्यर्थियों को सूची से बाहर किया गया, जबकि कम अंक पाने वालों को संशोधित परिणाम में जगह दी गई है. अदालत ने इसे चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न माना है.
यह याचिका किशोर कुमार और अन्य अभ्यर्थियों की ओर से अधिवक्ता चंचल जैन ने दायर की थी. मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति अनंदा सेन की एकल पीठ में हुई. सुनवाई के दौरान अधिवक्ता ने बताया कि याचिकाकर्ताओं के नाम प्रारंभिक सूची में थे और उन्हें जिला स्तरीय काउंसलिंग में भी बुलाया गया था. वहां उन्हें उनके अंक दिखाए गए थे.
लेकिन संशोधित परिणाम जारी होने के बाद उन्हें सूची से बाहर कर दिया गया. अधिवक्ता ने बताया कि कई ऐसे उदाहरण सामने आए हैं जहां कम अंक पाने वाले अभ्यर्थियों को सूची में बनाए रखा गया है, जबकि अधिक अंक वाले उम्मीदवारों को बाहर कर दिया गया है. उन्होंने कहा कि सभी याचिकाकर्ताओं ने अपने वर्ग में उच्च अंक प्राप्त किए हैं और वे TET भी पास हैं, ऐसे में उन्हें बाहर किया जाना चयन प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठाता है.
अदालत ने इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए पूछा कि जब अधिक अंक वाले उपलब्ध थे तो कम अंक वालों को रखने का आधार क्या है. कोर्ट ने मामले को गंभीर मानते हुए याचिकाकर्ताओं के लिए पद सुरक्षित रखने का अंतरिम आदेश पारित किया है. साथ ही JSSC को निर्देश दिया है कि वह अपने काउंटर अफिडेविट में पूरे तथ्यों के साथ बताए कि किन कारणों से अधिक अंक प्राप्त करने वाले उम्मीदवारों को संशोधित सूची से बाहर किया गया.
यह मामला झारखंड में प्रतियोगी भर्ती प्रक्रियाओं की विश्वसनीयता और पारदर्शिता पर बड़ा सवाल खड़ा करता है. अधिक अंक वाले अभ्यर्थियों को बाहर कर कम अंक वालों को शामिल करने का आरोप चयन प्रक्रिया को संदिग्ध बनाता है. हाईकोर्ट का कड़ा रुख इस बात का संकेत है कि न्यायपालिका भर्ती से जुड़ी अनियमितताओं को लेकर गंभीर है. JSSC के जवाब पर अब सबकी नजर होगी क्योंकि उससे ही यह स्पष्ट होगा कि यह तकनीकी गलती थी, प्रशासनिक चूक थी या नियमों की गलत व्याख्या.