जैसे-जैसे सूर्योदय हुआ, श्रद्धालुओं ने श्रद्धापूर्वक डुबकी लगाकर भगवान श्री हरि विष्णु और जगन्नाथ महाप्रभु की आराधना की और अपने परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की। इस दौरान, दान-पुण्य की प्राचीन परंपरा को निभाते हुए, भक्तों ने जरूरतमंदों के बीच अन्न, वस्त्र और दक्षिणा का दान कर पुण्य अर्जित किया।
नदी तटों पर दिखा भक्तिमय दृश्य
नदी तटों का माहौल पूरी तरह से भक्तिमय हो उठा था। महिलाएं एकाग्रचित्त होकर दीपदान और पूजा-अर्चना में लीन थीं, वहीं पुरुष भक्ति गीतों के गायन से पूरे वातावरण को श्रद्धामय बना रहे थे। यह अद्भुत दृश्य आध्यात्मिक ऊर्जा और शांति का प्रतीक बन गया। सुबह से लेकर दोपहर तक घाटों पर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा।
सुरक्षा व्यवस्था रही चाक-चौबंद
जिला प्रशासन और पुलिस बल के जवान पूरे मुस्तैदी से व्यवस्था बनाए रखने में लगे रहे। यातायात प्रबंधन और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर विशेष सावधानी बरती गई ताकि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो।
सुख-शांति तथा समृद्धि की कामना के साथ धूमधाम से मनाई जाती
ओड़िया संस्कृति की सदियों पुरानी बोइत बंदाण परंपरा कार्तिक पूर्णिमा का यह पर्व ओड़िया संस्कृति में बोइत बंदाण (नौका वंदना) पर्व के रूप में भी जाना जाता है, जो प्राचीन समुद्री व्यापार की गौरवशाली परंपरा से जुड़ा है। मान्यता है कि ओड़िया व्यापारी इसी दिन विशाल जलपोतों पर सवार होकर व्यापारिक यात्रा की पुनः शुरुआत करते थे।
आध्यात्मिक विरासत को दर्शाता है
यात्रा की सफलता और सकुशल वापसी के लिए विशेष पूजा-अर्चना की जाती थी। आज भी यह परंपरा जीवित है और परिवार की सुख-शांति तथा समृद्धि की कामना के साथ धूमधाम से मनाई जाती है। यह पर्व भारतीय संस्कृति की समृद्ध ऐतिहासिक और आध्यात्मिक विरासत को दर्शाता है।
