National News: कांग्रेस ने मोदी सरकार पर एक बार फिर गंभीर आरोप लगाए हैं. पार्टी ने कहा है कि सरकार ने भारतीय जीवन बीमा निगम यानी एलआईसी से जबरन गौतम अडानी की कंपनियों में 34 हजार करोड़ रुपये का निवेश कराया. कांग्रेस का दावा है कि यह निवेश तब करवाया गया जब अमेरिका में अडानी समूह पर रिश्वतखोरी के मामले दर्ज हुए थे और विदेशी बैंकों ने उन्हें कर्ज देने से इनकार कर दिया था. पार्टी ने कहा कि मोदी सरकार ने अपने “परम मित्र” को बचाने के लिए देश की जनता की गाढ़ी कमाई को दांव पर लगा दिया.
कांग्रेस ने एक्स पर एक पोस्ट करते हुए लिखा कि नरेंद्र मोदी अपने करीबी अडानी के लिए कुछ भी कर सकते हैं, यहां तक कि करोड़ों भारतीयों की जमा पूंजी भी जोखिम में डाल सकते हैं. पार्टी ने कहा कि वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट में भी यह बात सामने आई है कि एलआईसी पर दबाव बनाकर अडानी समूह में करीब 3.9 बिलियन डॉलर यानी लगभग 34 हजार करोड़ रुपये का निवेश करवाया गया.
पार्टी ने आरोप लगाया कि एलआईसी पहले ही अडानी के शेयरों में निवेश कर अरबों का नुकसान झेल चुकी थी, इसके बावजूद सरकार ने जबरन फिर से निवेश का आदेश दिया. कांग्रेस ने कहा कि यह पैसा देश के नागरिकों की खून-पसीने की कमाई है, जिसे मोदी सरकार अपने दोस्त को डूबने से बचाने के लिए इस्तेमाल कर रही है.
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी मोदी सरकार पर तीखा हमला बोला. उन्होंने कहा कि डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर योजना का असली लाभ आम जनता को नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री के “परम मित्र” को मिल रहा है. उन्होंने सवाल उठाया कि क्या एक आम सैलरीड मिडल क्लास व्यक्ति, जो हर महीने एलआईसी में अपनी मेहनत की कमाई जमा करता है, जानता है कि उसकी यह पूंजी अडानी को बेलआउट देने में लगाई जा रही है.
खड़गे ने कहा कि यह केवल धोखाधड़ी नहीं, बल्कि जनता के विश्वास से किया गया गंभीर विश्वासघात है. उन्होंने सवाल किया कि जब अडानी के शेयरों में 2023 में 32 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई थी, तब भी एलआईसी और एसबीआई के 525 करोड़ रुपये अडानी के एफपीओ में क्यों लगाए गए. खड़गे ने कहा कि मोदी सरकार बताये कि मई 2025 में अडानी समूह की विभिन्न कंपनियों में 33 हजार करोड़ रुपये लगाने की जो योजना थी, उस पर सरकार की क्या स्थिति है.
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने भी मामले पर प्रतिक्रिया दी और इसे “मोदानी महाघोटाला” करार दिया. उन्होंने कहा कि हाल ही में सामने आए दस्तावेज बताते हैं कि भारतीय अधिकारियों ने एलआईसी को अडानी समूह में निवेश करने के लिए विवश किया ताकि अडानी कंपनियों में विश्वास का संदेश दिया जा सके. जयराम रमेश ने कहा कि यह खुलासा बेहद परेशान करने वाला है क्योंकि इसमें 30 करोड़ एलआईसी पॉलिसी धारकों की मेहनत की कमाई का दुरुपयोग हुआ है.
उन्होंने कहा कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच केवल संसद की एक संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) ही कर सकती है. कांग्रेस तीन वर्षों से इसकी मांग कर रही है. जयराम रमेश ने कहा कि अगर जेपीसी नहीं बनती तो कम से कम संसद की लोक लेखा समिति (पीएसी) को यह जांच करनी चाहिए कि कैसे एलआईसी को अडानी समूह में निवेश के लिए मजबूर किया गया.
कांग्रेस के इन आरोपों ने एक बार फिर एलआईसी के निवेश ढांचे और सरकार के प्रभाव पर बहस छेड़ दी है. अगर वाकई एलआईसी पर राजनीतिक दबाव बनाकर निवेश करवाया गया है तो यह न सिर्फ़ संस्थागत स्वायत्तता पर आघात है बल्कि करोड़ों पॉलिसी धारकों के भरोसे के साथ सीधा खिलवाड़ भी है. दूसरी ओर, यह भी सच है कि एलआईसी लंबे समय से सरकारी नीतियों का एक वित्तीय उपकरण बनकर काम करती रही है. लेकिन यदि इस बार यह निवेश किसी कॉर्पोरेट को बचाने के लिए किया गया है, तो यह लोकतांत्रिक जवाबदेही और आर्थिक पारदर्शिता दोनों पर गहरी चोट है. ऐसे में यह मामला सिर्फ़ राजनीतिक बयानबाजी का नहीं बल्कि आर्थिक नैतिकता और सार्वजनिक संस्थाओं की स्वतंत्रता का भी गंभीर सवाल बन गया है.