अम्मा छठ के लिए विशेष रूप से बांस के सूप, डलिया और डलिया डाला तैयार करती आ रही
पिछले कई दशकों से, अम्मा छठ के लिए विशेष रूप से बांस के सूप, डलिया और डलिया डाला तैयार करती आ रही हैं। उनकी मेहनत से बना हर सामान श्रद्धा, परिश्रम और कला की कहानी कहता है। इस उम्र में जहां लोग आराम करना पसंद करते हैं, वहीं राजेश्वरी अम्मा आज भी रोजाना करीब 40 सूप और 20 से अधिक डलिया अपने हाथों से तैयार करती हैं।
जब तक हाथों में जान है, तब तक मैं ये काम करती रहूंगी
राजेश्वरी अम्मा का दृढ़ संकल्प उनकी जुबान पर है। वे कहती हैं, "जब तक हाथों में जान है, तब तक मैं ये काम करती रहूंगी। छठ सिर्फ पर्व नहीं, हमारे संस्कार हैं।" स्थानीय लोग उन्हें गुरु मानते हैं और बताते हैं कि बारीडीह चौक की गलियों में सुबह-सुबह उनकी कारीगरी की खनक सुनाई देती है। दूर-दूर से खरीदार विशेष रूप से उनसे सूप और डलिया लेने आते हैं, क्योंकि उनके बनाए सामान में न केवल बेहतरीन गुणवत्ता होती है, बल्कि एक गहरी आत्मीयता भी झलकती है। कई खरीदारों का मानना है कि अम्मा की मेहनत और आत्मीयता वाला सूप कहीं और नहीं मिलता।
यह कला उनके परिवार की पहचान
अम्मा ने यह हुनर अपने पति से सीखा था, और अब यह कला उनके परिवार की पहचान बन गई है। उनके कई शिष्य और बच्चे भी इसी हुनर को सीखकर अपनी दुकानें चला रहे हैं, लेकिन अम्मा की कला का मुकाबला कोई नहीं कर सका। इस वर्ष, छठ के लिए बड़े सूप की कीमत ₹120 और डलिया की कीमत ₹100 रखी गई है।
राजेश्वरी अम्मा को काम करते देखना एक सच्ची प्रेरणा
राजेश्वरी अम्मा को काम करते देखना एक सच्ची प्रेरणा है। उनकी लगन यह बताती है कि उम्र चाहे कितनी भी हो जाए, अगर मन में उत्साह और लगन हो, तो हर दिन एक नया उत्सव बन सकता है।