Ranchi News: झारखंड में सड़क और पुल निर्माण की नई परियोजनाएं लगातार बढ़ रही हैं, लेकिन इन योजनाओं की शुरुआती तैयारी संभालने वाली पथ निर्माण विभाग की एडवांस प्लानिंग विंग संसाधनों और कर्मचारियों की कमी से जूझ रही है। पर्याप्त इंजीनियर और तकनीकी कर्मी नहीं होने के कारण विभाग को सर्वे, डीपीआर तैयार करने और मिट्टी व अन्य सामग्रियों की जांच जैसे काम निजी एजेंसियों को सौंपने पड़ रहे हैं।
25 साल से नहीं बदला विभागीय ढांचा
एडवांस प्लानिंग विंग के तहत फिलहाल दो सर्वे प्रमंडल, एक मिट्टी जांच प्रमंडल और एक योजना-सह-जांच प्रमंडल काम कर रहे हैं। इन चार प्रमंडलों में चार कार्यपालक अभियंता, लगभग 37 सहायक अभियंता और 36 कनीय अभियंता तैनात हैं।
विभाग से जुड़े लोगों का कहना है कि यह संरचना करीब 25 साल पुरानी है। इस दौरान राज्य में सड़क और पुल निर्माण से जुड़ी योजनाओं में काफी बढ़ोतरी हुई, लेकिन इंजीनियरों और कर्मचारियों की संख्या उसी अनुपात में नहीं बढ़ाई गई।
इंजीनियरों के वेतन पर 70 लाख रुपये मासिक खर्च
इन चार प्रमंडलों में कार्यरत इंजीनियरों के वेतन पर विभाग हर महीने करीब 70 लाख रुपये खर्च करता है। इसके बावजूद कई महत्वपूर्ण तकनीकी कार्य निजी कंसल्टेंट और कंपनियों से कराने पड़ रहे हैं। काम का बढ़ता दबाव, सीमित मानव संसाधन और नई तकनीक के इस्तेमाल के साथ कम समय में डीपीआर तैयार करने की जरूरत को इसकी प्रमुख वजह माना जा रहा है।
डीपीआर और जांच कार्य पर करोड़ों की मंजूरी
सड़क और पुल निर्माण योजनाओं की डीपीआर तैयार कराने और सामग्री की जांच के लिए सरकार को अलग से बड़ी रकम खर्च करनी पड़ रही है। मौजूदा वित्तीय वर्ष में डीपीआर और सामग्री परीक्षण के लिए दो अलग-अलग आदेशों के तहत 5.5 करोड़ रुपये और 6.5 करोड़ रुपये से अधिक की मंजूरी दी गई है। इसके अलावा पुलों की डीपीआर और टेस्टिंग पर भी अलग से खर्च किया जा रहा है।
CDO करता है अंतिम तकनीकी परीक्षण
पथ निर्माण विभाग का सेंट्रल डिजाइन ऑर्गेनाइजेशन (CDO) सभी डीपीआर की अंतिम तकनीकी जांच करता है। डीपीआर विभागीय इंजीनियरों द्वारा तैयार की गई हो या किसी निजी कंपनी द्वारा, तकनीकी मंजूरी से पहले अनुभवी इंजीनियरों की टीम इसकी समीक्षा करती है। जांच के बाद ही संबंधित परियोजना को तकनीकी स्वीकृति देने की प्रक्रिया आगे बढ़ती है।
चार की जगह 12 प्रमंडल बनाने की मांग
विभाग के इंजीनियरों का मानना है कि बढ़ते काम को देखते हुए मौजूदा चार प्रमंडल पर्याप्त नहीं हैं। उन्होंने कम से कम 12 प्रमंडल बनाने का सुझाव दिया है। साथ ही सड़क और पुल परियोजनाओं के लिए अलग-अलग प्रमंडल गठित करने की बात भी कही गई है।
इंजीनियरों का कहना है कि यदि विभाग में पर्याप्त स्टाफ और आधुनिक तकनीकी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं तो डीपीआर, डिजाइन और जांच से जुड़े अधिकतर काम विभाग खुद कर सकता है। इससे निजी कंपनियों पर निर्भरता कम होने के साथ सरकारी खर्च में भी बचत संभव है।