संसद में विधेयक पेश, बैंकों को मिल सकती है बड़ी राहत
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने “टैक्सेशन एंड अदर लॉज अमेंडमेंट बिल” के माध्यम से डिजिटल पेमेंट्स पर बैंकों और पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स (PSPs) पर लगे शून्य-MDR के प्रतिबंध को हटाने का प्रस्ताव संसद में रखा है. यदि संसद से इस संशोधन बिल को मंजूरी मिल जाती है, तो सरकार को जरूरत के मुताबिक मर्चेंट लेनदेन पर शुल्क तय करने का कानूनी अधिकार मिल जाएगा. फिलहाल, इस नई व्यवस्था को लागू करने की किसी तारीख का आधिकारिक ऐलान नहीं किया गया है.
आम जनता पर नहीं पड़ेगा कोई प्रभाव, 95% ट्रांजैक्शन रहेंगे फ्री
इस प्रस्ताव के लागू होने के बाद भी सामान्य नागरिक और छोटे कारोबारी पूरी तरह अप्रभावित रहेंगे. व्यक्ति-से-व्यक्ति (P2P) के बीच होने वाले सभी ट्रांसफर पहले की तरह बिल्कुल मुफ्त रहेंगे. इसके अलावा 2,000 रुपये से कम के रोजमर्रा के ट्रांजैक्शन-जैसे किराना, सब्जी, दूध, दवा, ऑटो और टैक्सी के भुगतान पर कोई अतिरिक्त चार्ज नहीं लगेगा. आंकड़ों के मुताबिक, देश में होने वाले कुल यूपीआई लेनदेन का लगभग 95 प्रतिशत हिस्सा इसी दायरे में आता है, जो पूरी तरह मुफ्त रहेगा.
5% बड़े ट्रांजैक्शन और 65% कुल वैल्यू पर पड़ेगा असर
सरकारी आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि 2,000 रुपये से ज्यादा के मर्चेंट ट्रांजैक्शन कुल लेनदेन की संख्या का महज 5 प्रतिशत हैं. हालांकि, कुल वैल्यू के नजरिए से इनकी हिस्सेदारी लगभग 65 प्रतिशत के करीब है. जुलाई के आंकड़ों के अनुसार, देश भर में करीब 23.7 अरब यूपीआई ट्रांजैक्शन दर्ज किए गए थे, जिनका कुल मूल्य लगभग 29.9 लाख करोड़ रुपये रहा.
डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम को मजबूत बनाने की पहल
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यूपीआई के तेजी से बढ़ते ढांचे को लंबे समय तक बेहतर बनाए रखने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर और सुरक्षा पर काफी खर्च करना पड़ता है. बैंकों और फिनटेक कंपनियों की लागत की भरपाई के उद्देश्य से ही मर्चेंट शुल्क के इस मॉडल पर विचार किया जा रहा है, जिससे भारत का डिजिटल पेमेंट ढांचा और अधिक मजबूत बन सके.