Dhalbhumgarh Airport Update: धालभूमगढ़ एयरपोर्ट परियोजना की सबसे महत्वपूर्ण चरण में पहुंच गई है. लंबे समय से इस परियोजना के लिए पर्यावरणीय स्वीकृति की राह देख रहा था. अब भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (AAI) ने बड़ा कदम उठाया है. पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) की 19 आपत्तियों के जवाब में AAI ने एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की और इसे अधिकारियों को सौंप दिया है. इस रिपोर्ट को परिवेश (PARIVESH) पोर्टल पर भी अपलोड कर दिया गया है.
AAI ने रांची स्थित बिरसा मुंडा एयरपोर्ट के निदेशक विनोद कुमार के जरिए जमशेदपुर के प्रमंडलीय वन अधिकारी (DFO) को रिपोर्ट सौंपी है. इस रिपोर्ट में वन भूमि डायवर्जन, हाथियों के कॉरिडोर, पेड़ों की कटाई, जल संरक्षण और परियोजना की उपयोगिता के सभी मुद्दों पर विस्तार से जवाब दिया गया है.
यह परियोजना नए ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट के बजाय द्वितीय विश्व युद्ध के समय बने निष्क्रिय हवाई पट्टी के पुनर्विकास की है. इसके बारे में AAI ने बताया है कि जमशेदपुर में मौजूदा सोनारी एरोड्रोम घनी आबादी के बीच है और उसका रनवे बहुत छोटा है. इसलिए व्यावसायिक विमानों के लिए इसकी क्षमता नहीं है. इसलिए धालभूमगढ़ को एक बेहतर विकल्प माना जा रहा है.
परियोजना के तहत 99.256 हेक्टेयर वन भूमि के उपयोग की बात कही गई है. इसमें 90.087 हेक्टेयर भूमि का उपयोग ऑपरेशनल एरिया के लिए किया जाएगा, जिसमें रनवे, टर्मिनल भवन, एप्रन और एप्रोच रोड शामिल हैं.
99 हेक्टेयर वन भूमि के बदले 50 वर्षों में 1,438 करोड़ रुपये का लाभ होगा. AAI ने संशोधित कॉस्ट-बेनिफिट एनालिसिस (CBA) भी मंत्रालय को भेजा है. रिपोर्ट के मुताबिक 99.256 हेक्टेयर वन भूमि के उपयोग से पर्यावरण को लगभग 29.56 करोड़ रुपये का नुकसान होगा. लेकिन इस परियोजना से पर्यावरण के बजाय समाज और अर्थव्यवस्था को 1,438.95 करोड़ रुपये का लाभ होगा. रिपोर्ट में परियोजना के बेनिफिट-कॉस्ट रेशियो को 1:48.6 बताया गया है.
परियोजना के दौरान 79,332 पेड़ और बांस के झुरमुट प्रभावित हो सकते हैं. AAI ने बताया कि इनमें से 60,233 पेड़ 10 से 30 सेंटीमीटर के छोटे और कम उम्र के हैं. हाथियों के आवागमन को लेकर उठाई गई आपत्तियों पर AAI ने कहा है कि राज्य वन विभाग और मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक (CWLW) के साथ मिलकर साइट-विशिष्ट वाइल्डलाइफ मैनेजमेंट प्लान तैयार किया जाएगा. इस योजना का पूरा खर्च AAI वहन करेगा.
एयरपोर्ट शुरू होने के बाद पूर्वी सिंहभूम, पश्चिमी सिंहभूम और सरायकेला-खरसावां के साथ-साथ पश्चिम बंगाल और ओडिशा के सीमावर्ती क्षेत्रों को सीधी हवाई सुविधा मिलेगी. अनुमान है कि शुरुआती वर्षों में प्रतिवर्ष लगभग 52 हजार यात्री इस एयरपोर्ट का उपयोग करेंगे. अगले 50 वर्षों में इस एयरपोर्ट से करीब 1,300 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त होने की उम्मीद है. एयरलाइंस शुल्क और अन्य सेवाओं से भी अतिरिक्त आय होगी.
एयरपोर्ट निर्माण के दौरान लगभग 250 श्रमिकों को 300 दिनों तक रोजगार मिलेगा. परियोजना शुरू होने के बाद एयरपोर्ट संचालन के लिए करीब 50 स्थायी पद सृजित किए जाएंगे. इसके अलावा परिवहन, लॉजिस्टिक्स, होटल, छोटे व्यापार और स्थानीय सेवा क्षेत्र को भी परियोजना से सीधा लाभ मिलने की उम्मीद है.
AAI ने पांच अलग-अलग अंडरटेकिंग (शपथ-पत्र) देकर स्पष्ट किया है कि स्वीकृत परियोजना सीमा के बाहर किसी अतिरिक्त वन भूमि का उपयोग बिना पूर्व अनुमति नहीं किया जाएगा. बिजली और जलापूर्ति के लिए मौजूदा राइट ऑफ वे (RoW) का उपयोग होगा. मृदा अपरदन रोकने, जल संरक्षण और जलभृत अध्ययन का पूरा खर्च भी AAI उठाएगा. इसके अलावा दोगुनी वन भूमि पर क्षतिपूरक वनीकरण (Compensatory Afforestation) का प्रस्ताव भी परिवेश पोर्टल पर अपलोड कर दिया गया है.
धालभूमगढ़ एयरपोर्ट परियोजना की घोषणा 2019 में केंद्र सरकार की उड़ान (UDAN) योजना के तहत की गई थी. हालांकि प्रस्तावित क्षेत्र का कुछ हिस्सा हाथी कॉरिडोर और आरक्षित वन क्षेत्र में आने के कारण परियोजना की पर्यावरणीय और वन स्वीकृति लंबित रही.
अब AAI के द्वारा सभी 19 आपत्तियों के जवाब और अनुपालन रिपोर्ट सौंपे जाने के बाद परियोजना की फॉरेस्ट क्लीयरेंस मिलने की संभावना अब पहले की तुलना में काफी मजबूत है.