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  • 2026-07-16

Jharkhand High Court : JAP कांस्टेबल की बर्खास्तगी रद्द, चार्जशीट से बाहर के आरोपों पर कार्रवाई को बताया अवैध

Jharkhand High Court : झारखंड हाईकोर्ट ने झारखंड आर्म्ड पुलिस (JAP) के कांस्टेबल भरत पाठक की बर्खास्तगी को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए विभाग की ओर से जारी बर्खास्तगी आदेश को रद्द कर दिया है। अदालत ने इसे अवैध और मनमाना करार देते हुए स्पष्ट किया कि किसी सरकारी कर्मचारी को केवल उन्हीं आरोपों के आधार पर दंडित किया जा सकता है, जो विभागीय चार्जशीट में शामिल हों। चार्जशीट से बाहर के आरोपों के आधार पर सजा देना कानून सम्मत नहीं है।


मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति दीपक रोशन की अदालत ने विभागीय कार्रवाई की वैधता की समीक्षा की। कोर्ट ने पाया कि विभागीय चार्जशीट में भरत पाठक पर केवल एक विवाहित महिला से संबंध रखने और अनुशासनहीनता का आरोप लगाया गया था। हालांकि अंतिम बर्खास्तगी आदेश में दर्ज दुष्कर्म की एफआईआर को आधार बनाया गया, जबकि यह आरोप विभागीय चार्जशीट का हिस्सा नहीं था।

कोर्ट ने विभागीय प्रक्रिया पर उठाए सवाल, कहा- प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन जरूरी

अदालत ने कहा कि सेवा नियमों के तहत किसी कर्मचारी को वही आरोप बताकर जवाब देने का अवसर दिया जाना चाहिए, जिनके आधार पर कार्रवाई प्रस्तावित हो। यदि अंतिम दंड ऐसे आरोपों पर आधारित हो जो चार्जशीट में शामिल ही नहीं थे, तो पूरी प्रक्रिया कानून के अनुरूप नहीं मानी जा सकती।

सुनवाई में साक्ष्यों की कमी का भी हुआ उल्लेख

सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी कहा कि शिकायतकर्ता के बयानों के अलावा कथित आरोपों के समर्थन में पर्याप्त दस्तावेजी साक्ष्य पेश नहीं किए गए। कथित विवाह का कोई प्रमाण, होटल की सीसीटीवी फुटेज या साथ रहने से संबंधित किसी किराये के मकान के दस्तावेज अदालत के समक्ष प्रस्तुत नहीं किए गए।

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि विभाग ने जिस आधार पर बर्खास्तगी का आदेश पारित किया, वह विभागीय चार्जशीट में शामिल ही नहीं था। अदालत ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए बर्खास्तगी आदेश को निरस्त कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी किया उल्लेख

हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के जोसेफ शाइन बनाम भारत संघ मामले का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि इस फैसले के बाद व्यभिचार (Adultery) अब आपराधिक अपराध नहीं है। ऐसे में केवल इस आधार पर कठोर विभागीय कार्रवाई को उचित नहीं ठहराया जा सकता। हालांकि अदालत का मुख्य आधार विभागीय कार्रवाई में अपनाई गई प्रक्रिया और चार्जशीट से बाहर के आरोपों पर दंड देना रहा।


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