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  • 2026-07-12

Salima Tete Journey: बांस की स्टिक से भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तानी तक, सिमडेगा की बेटी सलीमा टेटे की अटूट संघर्ष की कहानी

Salima Tete Journey (Kiran Das): झारखंड की सलीमा टेटे एक ऐसा नाम जिसने अपनी असाधारण खेल प्रतिभा और संघर्ष के दम पर भारतीय हॉकी में एक बड़ा मुकाम हासिल किया  है, और आज वो भारतीय महिला हॉकी टीम की एक प्रमुख खिलाड़ी और कप्तान भी हैं। सलीमा झारखंड राज्य के सिमडेगा जिले के बड़की छापर नामक छोटे से गांव की रहने वाली हैं। सलीमा का जन्म एक बेहद सामान्य और आर्थिक रूप से कमजोर आदिवासी परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम सुलक्षण टेटे जो पेशे से एक किसान है और खुद भी स्थानीय स्तर पर हॉकी खेला करते थे। उनकी मां सुभानी टेटे एक गृहिणी हैं| 


गरीबी से निकलकर हॉकी की नई पहचान

सलीमा के परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी की जीवन-यापन के लिए उनकी मां और बड़ी बहन को दूसरों के घरों में खाना बनाने और बर्तन मांजने जैसे काम करने पड़ते थे| सलीमा ने अपने गांव के बंजर जमीन में बांस की लकड़ियों से हॉकी खेलना शुरू किया था, बाद में  उन्होंने झारखंड महिला हॉकी अकादमी से प्रशिक्षण लेकर अपनी प्रतिभा को निखारा और अपनी तेज रफ्तार, बेहतरीन बॉल कंट्रोल तथा आक्रामक मिडफील्ड खेल के दम पर भारतीय टीम में अपनी खास पहचान बनाई।


शुरुआती संघर्ष और कड़ी मेहनत

शुरुआत में सलीमा को सिमडेगा के मुख्य हॉकी आवासीय केंद्र में दाखिला नहीं मिल पाया था। जिसके बाद उन्होंने दो साल तक कल्याण विभाग के एक छोटे से हॉस्टल में रहकर अपनी कड़ी प्रैक्टिस की, उनकी अटूट मेहनत और प्रतिभा को देखते हुए वर्ष 2013 में उन्हें सिमडेगा हॉकी आवासीय केंद्र में शामिल किया गया| इसके महज दो महीने के भीतर ही उनका चयन झारखंड की स्कूल टीम (SGFI) में हो गया। इसके बाद 2014 में वे राज्य की सब-जूनियर टीम में शामिल हुई| साल 2016 में स्पेन के दौरे पर पहली बार सलीमा को जूनियर भारतीय महिला टीम के लिए चुना गया| 2018 में अर्जेंटीना के ब्यूनस आयर्स में हुए यूथ ओलंपिक खेलों में सलीमा ने भारतीय जूनियर टीम का नेतृत्व किया और भारत को ऐतिहासिक रजत पदक दिलाया


वर्ष 2021 के टोक्यो ओलंपिक में चौथे स्थान पर रही भारतीय महिला हॉकी टीम की प्रमुख मिडफील्डर के रूप में सलीमा टेटे ने शानदार प्रदर्शन किया। उनकी नेतृत्व क्षमता और लगातार बेहतरीन प्रदर्शन को देखते हुए वर्ष 2024 में उन्हें भारतीय सीनियर महिला हॉकी टीम की नियमित कप्तान बनाया गया। वर्तमान में भी वे सफलतापूर्वक टीम का नेतृत्व कर रही हैं। सलीमा टेटे प्रतिष्ठित “अर्जुन पुरस्कार” प्राप्त करने वाली झारखंड की पहली महिला हॉकी खिलाड़ी हैं।



सलीमा टेटे की ये कहानी सिर्फ एक खिलाड़ी की सफलता नहीं, बल्कि यह इस बात का प्रमाण है कि कड़ी मेहनत और दृढ़ संकल्प के सामने आर्थिक अभाव कभी बाधा नहीं बन सकते। एक छोटे से गांव से निकलकर भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तान बनना और अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित होना हर युवा, खासकर ग्रामीण और आदिवासी बेटियों के लिए किसी प्रेरणा से कम नहीं है| उनकी ये संघर्ष बताती है कि सही अवसर, मेहनत और आत्मविश्वास के दम पर कोई भी व्यक्ति अपने सपनों को साकार कर सकता है। सलीमा आज सिर्फ झारखंड ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए गर्व और प्रेरणा का प्रतीक बन चुकी हैं, सिर्फ सलीमा टेटे ही नहीं बल्कि बहुत से ऐसे लोग है जिन्होंने साधन की कमी होने के बावजूद भी अपने दृढ़ संकल्प और कड़ी मेहनत के बदोलत सफलता हासिल की है|

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