Amarnath Yatra 2026: इस वर्ष अमरनाथ यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं के बीच एक सवाल सबसे ज्यादा चर्चा में है। यात्रा शुरू होने के कुछ ही दिनों बाद पवित्र गुफा में प्राकृतिक रूप से बनने वाला बर्फ का शिवलिंग काफी छोटा हो गया है। पहले जहां बाबा बर्फानी का स्वरूप लंबे समय तक दर्शन देता था, वहीं इस बार शुरुआती दिनों में ही उसके तेजी से पिघलने की खबर सामने आई है। इस बदलाव ने न केवल श्रद्धालुओं को हैरान किया है, बल्कि वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों का भी ध्यान आकर्षित किया है।
यात्रा के शुरुआती दिनों में ही बदला नजारा
जुलाई की शुरुआत में शुरू हुई अमरनाथ यात्रा में इस बार भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। शुरुआती चार दिनों में ही करीब 85 हजार से अधिक श्रद्धालुओं ने बाबा बर्फानी के दर्शन किए। हालांकि, बाद में पहुंचने वाले कई श्रद्धालुओं को पहले जैसा विशाल हिम शिवलिंग देखने को नहीं मिला। जुलाई के पहले सप्ताह तक शिवलिंग का बड़ा हिस्सा पिघल चुका था, जिससे इसके तेजी से घटने को लेकर चर्चाएं तेज हो गईं।
प्राकृतिक प्रक्रिया से बनता है हिम शिवलिंग
अमरनाथ गुफा में बनने वाला शिवलिंग किसी मानव निर्मित संरचना का परिणाम नहीं है। यह पूरी तरह प्राकृतिक प्रक्रिया से तैयार होता है। गुफा की छत से लगातार टपकने वाली पानी की बूंदें अत्यधिक ठंडे तापमान में जमकर धीरे-धीरे बर्फ का स्तंभ बना देती हैं। भू-विज्ञान में इस तरह बनने वाली संरचना को स्टैलेग्माइट (Stalagmite) कहा जाता है। यही बर्फ का स्तंभ श्रद्धालुओं के लिए बाबा बर्फानी के रूप में पूजनीय माना जाता है। इस प्राकृतिक निर्माण की प्रक्रिया सर्दियों में होने वाली बर्फबारी, गुफा के अंदर के तापमान और वातावरण की नमी पर निर्भर करती है। यदि इनमें कोई बदलाव आता है तो शिवलिंग के बनने और टिके रहने की अवधि भी प्रभावित होती है।
जलवायु परिवर्तन को माना जा रहा प्रमुख कारण
विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में हिमालयी क्षेत्र के मौसम में बड़े बदलाव देखने को मिले हैं। सर्दियों में पहले की तुलना में कम बर्फबारी हो रही है, जबकि गर्मियों के दौरान तापमान लगातार बढ़ रहा है। पर्याप्त बर्फ और लंबे समय तक ठंड नहीं रहने के कारण गुफा के भीतर बनने वाला हिम शिवलिंग मजबूत नहीं बन पाता। इसके बाद गर्म मौसम शुरू होते ही बर्फ तेजी से पिघलने लगती है। यही वजह है कि पहले जहां शिवलिंग सावन के अधिकांश समय तक बना रहता था, अब वह यात्रा के शुरुआती चरण में ही छोटा होने लगता है।
मानवीय गतिविधियां भी डालती हैं असर
विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि यात्रा के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की मौजूदगी से आसपास के वातावरण पर कुछ असर पड़ता है। लगातार लोगों की आवाजाही, कृत्रिम प्रकाश व्यवस्था, हेलीकॉप्टर संचालन, वाहनों से निकलने वाला धुआं और अन्य गतिविधियां स्थानीय तापमान को प्रभावित कर सकती हैं। हालांकि वैज्ञानिकों का मानना है कि इनका प्रभाव सीमित है और सबसे बड़ा कारण वैश्विक जलवायु परिवर्तन (Climate Change) है, जिसने हिमालयी क्षेत्रों के प्राकृतिक संतुलन को प्रभावित किया है।
पर्यावरण संरक्षण पर बढ़ा जोर
विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को सुरक्षित रखने के लिए पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों को और मजबूत करने की आवश्यकता है। यदि जलवायु परिवर्तन की रफ्तार पर प्रभावी नियंत्रण नहीं किया गया, तो भविष्य में ऐसे प्राकृतिक धार्मिक स्थलों पर भी इसका असर और अधिक स्पष्ट दिखाई दे सकता है।