Jharkhand: झारखंड हाईकोर्ट में बुधवार को रांची विश्वविद्यालय के आईएलएस (ILS) से जुड़ी याचिका (WPC 141/2026) पर महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। अंबेश चौबे व अन्य द्वारा दायर इस याचिका पर अदालत ने कड़ा रुख अपनाया है। दरअसल, पिछली सुनवाई के दौरान कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को संस्थान का भौतिक निरीक्षण करने का जिम्मा सौंपा था। 5 मई 2026 को बीसीआई की टीम ने जांच के बाद जो रिपोर्ट पेश की, उसने संस्थान की शैक्षणिक और प्रशासनिक व्यवस्थाओं की कलई खोलकर रख दी है। रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि संस्थान कई बुनियादी मापदंडों को पूरा करने में पूरी तरह विफल रहा है।
निदेशक की पृष्ठभूमि और फैकल्टी की कमी पर उठे सवाल
बार काउंसिल ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में जो सबसे चौंकाने वाला खुलासा हुआ है, वह संस्थान के नेतृत्व से जुड़ा है। रिपोर्ट के अनुसार, आईएलएस में गैर-कानूनी पृष्ठभूमि वाले निदेशक कार्यरत हैं और लंबे समय से किसी स्थायी निदेशक की नियुक्ति नहीं की गई है। इसके अलावा, संस्थान में शिक्षकों की भारी कमी पाई गई है और जो शिक्षक कार्यरत हैं, उन्हें यूजीसी (UGC) पे-स्केल के अनुरूप वेतन नहीं मिल रहा है। बुनियादी सुविधाओं के नाम पर भी स्थिति दयनीय है. मूट कोर्ट की हालत खराब है और लाइब्रेरी में कानून की अनिवार्य पुस्तकों का अभाव है। इन प्रशासनिक और शैक्षणिक लापरवाहियों ने विद्यार्थियों के भविष्य पर सवालिया निशान खड़ा कर दिया है।
8 जून तक का समय, अगली सुनवाई 9 जून को
उच्च न्यायालय ने बीसीआई की इन गंभीर आपत्तियों पर कड़ा संज्ञान लेते हुए रांची विश्वविद्यालय प्रशासन को कड़ी चेतावनी दी है। कोर्ट ने विश्वविद्यालय को निर्देशित किया है कि 8 जून 2026 तक रिपोर्ट में बताई गई सभी कमियों को हर हाल में दुरुस्त किया जाए। इसके साथ ही, विश्वविद्यालय को सुधार कार्यों की अनुपालन रिपोर्ट (Compliance Report) भी अदालत में दाखिल करनी होगी। इस मामले की अगली सुनवाई 9 जून 2026 को तय की गई है, जहां कोर्ट समीक्षा करेगा कि विश्वविद्यालय ने आदेशों का कितना पालन किया है। इस आदेश के बाद अब विश्वविद्यालय प्रबंधन में हड़कंप की स्थिति है।