Hazaribagh: हजारीबाग नगर निगम में लागू नई टेंडर व्यवस्था ने सफाई कार्य से जुड़े करीब 45 टिप्पर चालकों की जिंदगी को असमंजस और असुरक्षा के दौर में ला खड़ा किया है। लंबे समय से दैनिक मजदूर के रूप में काम कर रहे ये चालक पहले स्थायी रोजगार की उम्मीद में अपनी सेवाएं दे रहे थे, लेकिन अब आउटसोर्सिंग और ठेका प्रणाली के कारण उनकी स्थिति और कठिन हो गई है। कर्मचारियों का कहना है कि नगर निगम की सफाई व्यवस्था में वर्षों से योगदान देने के बावजूद उन्हें आज भी स्थायित्व और सुरक्षा नहीं मिल सकी है। टेंडर आधारित व्यवस्था लागू होने के बाद उनके सामने रोजगार छिनने और आय बंद होने का खतरा बढ़ गया है।
पुरानी कंपनी पर भुगतान रोकने का आरोप, नई एजेंसी को लेकर भी असंतोष
चालकों ने आरोप लगाया कि पहले उन्हें “राइडर” नामक कंपनी के माध्यम से काम कराया गया था। कर्मचारियों के अनुसार कंपनी ने दो महीने तक भुगतान लेने के बाद अचानक काम बंद कर दिया और श्रमिकों को बीच मझधार में छोड़ दिया। अब सफाई व्यवस्था का जिम्मा “गुरुदास” नामक नई कंपनी को 20 वर्षों के लिए सौंपा गया है, लेकिन उसकी कार्यप्रणाली को लेकर भी कर्मचारियों के बीच असंतोष और डर का माहौल बना हुआ है। उनका कहना है कि अब तक उन्हें काम और भुगतान से संबंधित स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई है, जिससे भविष्य को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।
निजी वाहन लगाने के दबाव से बढ़ी मजदूरों की परेशानी
कर्मचारियों का कहना है कि नई कंपनी की ओर से निजी टिप्पर वाहन लगाने का दबाव बनाया जा रहा है। उन्हें बताया गया है कि काम तभी मिलेगा जब वे अपने वाहन से कचरा उठाने का कार्य करेंगे। ऐसे में आर्थिक रूप से कमजोर चालकों पर अतिरिक्त बोझ पड़ गया है। श्रमिकों को आशंका है कि आने वाले समय में मानदेय भुगतान में देरी, कटौती या अन्य अनियमितताएं भी हो सकती हैं। उनका कहना है कि सेवा शर्तों और भुगतान को लेकर कोई स्पष्ट नीति सामने नहीं आने से असंतोष लगातार बढ़ता जा रहा है। शहर की सफाई व्यवस्था की मुख्य जिम्मेदारी संभालने वाले ये चालक खुद को उपेक्षित और असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।
नगर निगम की भूमिका पर उठे सवाल, अधिकारियों के बयान से बढ़ी नाराजगी
इस पूरे मामले में नगर निगम की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे हैं। नगर निगम के अधिकारी दीपक कुमार ने कहा कि पुरानी राइडर कंपनी के बकाया भुगतान को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। उन्होंने बताया कि इस विषय पर बातचीत हुई थी, लेकिन भुगतान हुआ या नहीं, इसकी जानकारी उनके पास नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि फिलहाल 36 टिप्पर चालक कार्य कर रहे हैं और नगर निगम की ओर से लगभग 16 हजार रुपये से अधिक मासिक भुगतान किया जा रहा है। साथ ही उन्होंने बताया कि एक महीने बाद नई कंपनी पूरी भुगतान व्यवस्था संभालेगी। वहीं नगर निगम के मेयर अरविंद कुमार ने मामले से दूरी बनाते हुए कहा कि कर्मचारियों को क्या भुगतान किया जा रहा है और कंपनी किस प्रकार काम कर रही है, इसकी विस्तृत जानकारी उनके पास नहीं है।
सफाई व्यवस्था संभालने वाले श्रमिक खुद महसूस कर रहे असुरक्षित
नगर निगम की मौजूदा स्थिति ने प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर शहर की सफाई व्यवस्था पूरी तरह इन श्रमिकों के भरोसे चल रही है, वहीं दूसरी ओर वही कर्मचारी रोजगार, भुगतान और भविष्य की चिंता में जी रहे हैं। सफाई व्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले ये टिप्पर चालक अब खुद को सबसे कमजोर और उपेक्षित कड़ी के रूप में देख रहे हैं।