Jamshedpur: धालभूमगढ़ एयरपोर्ट का सपना एक बार फिर कानूनी और प्रशासनिक पेच में उलझता नजर आ रहा है। वर्ष 2018 में शिलान्यास के बाद से ही विभिन्न अड़चनों का सामना कर रहे इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट के सामने अब भारतीय सेना ने जमीन पर अपना मालिकाना हक जताते हुए नया विवाद खड़ा कर दिया है। सेना की ओर से जिला प्रशासन को पत्र भेजकर एयरपोर्ट के लिए चिन्हित जमीन को रक्षा मंत्रालय के नाम म्यूटेशन करने का अनुरोध किया गया है, जिससे पूरे प्रोजेक्ट की प्रगति पर अनिश्चितता के बादल छा गए हैं और प्रशासनिक स्तर पर भी हलचल तेज हो गई है।
ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर किया गया दावा
सेना ने अपने दावे के समर्थन में पुराने दस्तावेजों का हवाला दिया है, जिसमें बताया गया है कि वर्ष 1943-44 में करीब 297.23 एकड़ और 1914-15 में 179.59 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया गया था। कुल मिलाकर 476.82 एकड़ भूमि के अधिग्रहण का प्रकाशन 8 मई 1945 को बिहार गजट में भी दर्ज किया गया था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इस क्षेत्र के धालभूमगढ़ और चाकुलिया एयरपोर्ट का उपयोग वायुसेना द्वारा किया गया था, हालांकि युद्ध समाप्त होने के बाद जमीन खाली कर दी गई थी। बाद में 1964 के सर्वे में यह जमीन वन विभाग, अनाबाद बिहार सरकार और रैयतदारों के नाम दर्ज हो गई। अब दानापुर कैंट स्थित रक्षा संपदा अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल ताकिर मुंताखान ने उपायुक्त राजीव रंजन को पत्र भेजकर जमीन को सेना के नाम दर्ज करने की मांग की है।
2018 से अब तक लगातार आ रही बाधाएं
यह परियोजना शुरू से ही विभिन्न कारणों से अटकती रही है। 2018 में तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुवर दास और केंद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा द्वारा शिलान्यास के बाद 2019 में हुए सत्ता परिवर्तन ने इसकी गति को प्रभावित किया। इसके अलावा एयरपोर्ट विस्तार के लिए बरूडीह, चारचक्का, घासीडीह, कनीमहुली और देवशोल गांवों की जमीन अधिग्रहण को लेकर स्थानीय ग्रामीणों ने भी विरोध जताया, जिससे मामला और जटिल होता चला गया।
वन विभाग की मंजूरी भी बनी बड़ी चुनौती
प्रस्तावित स्थल पर लगभग 79,000 पेड़ों और करीब 99 हेक्टेयर वन भूमि होने के कारण वन विभाग से एनओसी प्राप्त करना भी आसान नहीं रहा। लंबे प्रयासों के बाद इस क्षेत्र को एलिफेंट कॉरिडोर से बाहर माना गया, जिसके बाद वन विभाग ने शर्त रखी कि जितनी भूमि ली जाएगी, उतनी ही जमीन दूसरे स्थान पर उपलब्ध करानी होगी, तब जाकर एनओसी देने पर सहमति बनी। इस प्रक्रिया ने भी परियोजना को लंबे समय तक रोके रखा।
एयरपोर्ट नहीं बनने से हो रहा नुकसान
जमशेदपुर एक प्रमुख औद्योगिक शहर होने के बावजूद आज भी हवाई संपर्क के लिए रांची और कोलकाता जैसे शहरों पर निर्भर है। धालभूमगढ़ एयरपोर्ट का काम बाधित होने से दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और भुवनेश्वर जैसे बड़े शहरों के लिए सीधी उड़ानों की उम्मीद अधूरी रह गई है। बेहतर कनेक्टिविटी के अभाव में औद्योगिक विकास की रफ्तार भी प्रभावित हो रही है और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी सीमित हो रहे हैं। इसके साथ ही पर्यटन क्षेत्र पर भी इसका नकारात्मक असर पड़ रहा है, क्योंकि हवाई सुविधा न होने से पर्यटकों की आवाजाही सीमित बनी हुई है।
सोनारी एयरपोर्ट से छोटे विमानों की तैयारी
इधर, सोनारी एयरपोर्ट से छोटे विमानों के संचालन की दिशा में काम जारी है। फिलहाल यहां से 9 सीटर विमान कोलकाता और भुवनेश्वर के लिए उड़ान भर रहे हैं और एयरपोर्ट के विस्तार का कार्य भी चल रहा है। विस्तार पूरा होने के बाद अन्य शहरों के लिए भी छोटे विमानों के संचालन की संभावना जताई जा रही है, हालांकि बड़े विमानों के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचा अभी उपलब्ध नहीं है।
जमीन के कागजात पर बना संशय
धालभूमगढ़ एयरपोर्ट की जमीन को लेकर अब स्थिति और स्पष्ट नहीं हो पा रही है। एक ओर सेना अपने दावे पर कायम है, वहीं दूसरी ओर प्रशासन का कहना है कि जब तक जमीन से जुड़े पुख्ता कागजात प्रस्तुत नहीं किए जाते, तब तक इस दावे को स्वीकार करना संभव नहीं है। प्रशासन ने सेना से आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत करने को कहा है, जिसके बाद ही आगे की प्रक्रिया तय की जाएगी।