Tata Group Update: देश के प्रमुख प्रतिष्ठित संगठनों में गिने जाने वाले टाटा ट्रस्ट ने अपनी नीतियों में एक बड़ा बदलाव करने का निर्णय लिया है। चेयरमैन नोएल टाटा की अध्यक्षता में हुई बैठक में 100 साल से भी अधिक पुराने ट्रस्ट डीड में संशोधन का प्रस्ताव पारित किया गया। इस बदलाव का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अब ट्रस्टी बनने के लिए पारसी समुदाय से होना अनिवार्य नहीं रहेगा। ट्रस्ट का मानना है कि यह कदम संस्था को अधिक समावेशी, आधुनिक और समय के अनुरूप बनाने की दिशा में उठाया गया है।
1923 के नियमों की विसंगति को किया जाएगा दूर
ट्रस्ट के अनुसार ‘बाई हीराबाई जमशेदजी टाटा नवसारी चैरिटेबल इंस्टीट्यूशन’ के 1923 के नियमों में केवल पारसी समुदाय के लोगों को ही ट्रस्टी बनने की अनुमति दी गई थी। जबकि Ratan Tata द्वारा वर्ष 1916 में बनाई गई मूल वसीयत में धर्म या जाति के आधार पर कोई प्रतिबंध नहीं रखा गया था। इसी अंतर को दूर करने के लिए अब ट्रस्ट ने कदम उठाया है और इस विसंगति को समाप्त करने की दिशा में कानूनी प्रक्रिया शुरू करने का निर्णय लिया गया है। इसके तहत महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर के समक्ष आवश्यक संशोधन की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी।
विवाद के बाद लिया गया अहम फैसला
हाल के समय में इस मुद्दे को लेकर विवाद भी सामने आया था, जब पूर्व ट्रस्टी मेहली मिस्त्री ने गैर-पारसी सदस्यों की नियुक्ति पर सवाल उठाए थे। उन्होंने Venu Srinivasan और Vijay Singh की नियुक्ति को लेकर आपत्ति जताई थी। इस विवाद के बीच वेणु श्रीनिवासन ने ट्रस्ट से इस्तीफा भी दे दिया था। हालांकि ट्रस्ट ने स्पष्ट किया कि वर्ष 2000 में M. H. Kania की कानूनी राय के बाद से ही गैर-पारसी सदस्यों की नियुक्ति की जाती रही है, इसलिए यह कोई नया बदलाव नहीं बल्कि पहले से चली आ रही प्रक्रिया का विस्तार है।
समावेशी सोच और बेहतर गवर्नेंस पर जोर
टाटा समूह हमेशा से अपनी सामाजिक जिम्मेदारी और समावेशी सोच के लिए जाना जाता रहा है। इस संशोधन के जरिए ट्रस्ट अपने गवर्नेंस सिस्टम को और मजबूत करना चाहता है। Tata Trusts की Tata Sons में लगभग 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है, ऐसे में यह निर्णय न केवल ट्रस्ट बल्कि पूरे टाटा समूह की कार्यप्रणाली पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।
नेतृत्व पर जताया भरोसा, छवि होगी और मजबूत
बैठक के दौरान बोर्ड ने सीईओ Siddharth Sharma के नेतृत्व पर भी भरोसा जताया। विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से जहां एक ओर आंतरिक विवादों में कमी आएगी, वहीं दूसरी ओर ट्रस्ट की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर छवि और अधिक मजबूत होगी। यह कदम पारदर्शिता, समावेशिता और आधुनिक सोच की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।