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  • 2026-04-12

Ranchi News: रिम्स की लापरवाही उजागर, स्ट्रेचर न मिलने पर तड़पती रही गर्भवती महिला, खुद चलकर पहुंची वार्ड

Ranchi: रांची के रिम्स और झारखंड के सरकारी अस्पतालों की स्थिति को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। हालात ऐसे हैं कि एंबुलेंस, स्ट्रेचर और बुनियादी सुविधाएं भी मरीजों को समय पर उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं। व्यंग्यात्मक लहजे में कहा जाए तो क्या झारखंड के लोग इतने मजबूत हो गए हैं कि अब उन्हें अस्पताल पहुंचने के लिए एंबुलेंस की जरूरत नहीं रही, और वे बिना स्ट्रेचर के ही किसी तरह इलाज तक पहुंच जाएंगे। यह स्थिति सिर्फ एक टिप्पणी नहीं, बल्कि जमीनी सच्चाई को दर्शाती है, जहां मरीजों को अपनी पीड़ा के साथ खुद ही संघर्ष करना पड़ रहा है।

गुमला से रिम्स पहुंची रजनी देवी को नहीं मिला स्ट्रेचर
शनिवार को सामने आई एक घटना ने इस व्यवस्था की पोल खोल दी। गुमला की रहने वाली रजनी देवी को बेहतर इलाज के लिए रिम्स रेफर किया गया था। एंबुलेंस से किसी तरह वह अस्पताल तो पहुंच गईं, लेकिन वहां पहुंचने के बाद उन्हें स्ट्रेचर या व्हीलचेयर जैसी बुनियादी सुविधा भी नहीं मिल सकी। वह एंबुलेंस में ही दर्द से कराहती रहीं, जबकि उनके परिजन अस्पताल परिसर में इधर-उधर भागते रहे, ताकि किसी तरह उन्हें अंदर ले जाया जा सके। इस दौरान इंतजार और लाचारी का यह दृश्य अस्पताल की व्यवस्था पर कई सवाल खड़े करता रहा।

दर्द में खुद ही बढ़ाना पड़ा कदम
जब काफी देर तक कोई मदद नहीं मिली और इंतजार असहनीय हो गया, तब रजनी देवी ने खुद ही प्रसूता वार्ड की ओर बढ़ने का फैसला किया। दर्द से कराहते हुए, लड़खड़ाते कदमों के साथ उन्होंने किसी तरह आगे बढ़ना शुरू किया। हर कदम पर दर्द साफ झलक रहा था, लेकिन मजबूरी इतनी थी कि रुकने का कोई विकल्प नहीं था। गिरते-पड़ते वह किसी तरह लिफ्ट तक पहुंचीं और फिर आगे इलाज के लिए बढ़ीं। यह दृश्य न केवल एक महिला की पीड़ा को दर्शाता है, बल्कि सिस्टम की गंभीर खामियों को भी उजागर करता है।

व्यवस्था पर उठते सवाल और जिम्मेदारी की मांग
इस घटना के बाद एक बार फिर यह सवाल उठने लगा है कि क्या राज्य के सबसे बड़े अस्पताल में भी मरीजों को बुनियादी सुविधाएं नहीं मिल सकतीं। स्ट्रेचर और व्हीलचेयर जैसी सामान्य व्यवस्था का अभाव न केवल चिंता का विषय है, बल्कि यह पूरे स्वास्थ्य तंत्र की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़ा करता है। लोग यह जानना चाहते हैं कि आखिर कब तक मरीजों को इस तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ेगा और कब स्वास्थ्य व्यवस्था वास्तव में आम लोगों के लिए सहज और सुलभ बन पाएगी।
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