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  • 2026-04-06

Bokaro News: बोकारो में “विकास” या विस्थापन, 60 साल बाद उठे कई बड़े सवाल

Bokaro News: 1960 के दशक में बोकारो स्टील प्लांट के लिए करीब 34000 एकड़ जमीन ली गई थी। लेकिन आज हालत ये है कि उस जमीन का सिर्फ आधा हिस्सा ही इस्तेमाल हुआ है, बाकी हजारों एकड़ जमीन आज भी निष्क्रिय पड़ी है।


60 साल बाद भी अधूरा अधिग्रहण

2013 के जमीन अधिग्रहण कानून के मुताबिक, अगर सरकार के पास जमीन का सही कब्जा नहीं है या लोगों को मुआवजा नहीं मिला है, तो अधिग्रहण खुद ही खत्म माना जाता है। ऐसे में अब ये सवाल उठता है कि जब हजारों लोगों को आज तक मुआवजा मिला ही नहीं, और कई जगहों पर सरकार का कब्जा भी नहीं है, तो ये अधिग्रहण पूरा कैसे मान लिया गया?


60 साल से खाली पड़ी है जमीन

लोगों का कहना है कि जब 60 साल तक जमीन का इस्तेमाल ही नहीं हुआ, तो उसे जमीन के असली मालिकों यानी रैयतों को क्यों नहीं दिया जा रहा? अगर जमीन वापस मिलेगी, तो लोग कम से कम खेती करके अपना घर चला सकेंगे।


64 मौजा की जमीन ली, लेकिन न पुनर्वास मिला न हक

बोकारो में विकास के नाम पर 64 मौजा की जमीन ली गई थी। लेकिन आज भी सैकड़ों लोग गांवों में रह रहे हैं, जहां न सही पुनर्वास हुआ, न मुआवजा मिला और न ही उन्हें जमीन का मालिकाना हक मिला। हालत ये है कि ये लोग सरकारी योजनाओं जैसे पानी, बिजली, सड़क और इलाज से भी वंचित हैं।


विस्थापितों की पीढ़ियां बीतीं, समस्या जस की तस

इनका नाम वोटर लिस्ट में तो है, लेकिन अपने ही गांव में जन्म या मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाना मुश्किल है, क्योंकि सरकारी रिकॉर्ड में उनके गांव का नाम ही नहीं है। यानी उनका अस्तित्व ही मिटाने की कोशिश हो रही है।


दूसरी तरफ, उनकी जमीन पर बड़े-बड़े मॉल और शॉपिंग सेंटर बन रहे हैं। जब ये इलाका किसी नगर निगम के अंदर ही नहीं आता, तो यहां मॉल बनाने की अनुमति कौन दे रहा है?


20 मौजा जमीन फालतू घोषित, फिर भी रैयतों को वापस क्यों नहीं?

1973 में खुद प्लांट प्रशासन ने कहा था कि 20 मौजा की जमीन अब जरूरत की नहीं है। फिर भी आज तक वो जमीन असली मालिकों को वापस नहीं दी गई। लोग अपने ही गांव में रहते हैं, लेकिन कागज पर जमीन सरकार या प्लांट के नाम है।


इस वजह से न उन्हें पूरा मुआवजा मिला, न नौकरी और न ही जमीन का अधिकार। कई पीढ़ियां इस परेशानी में गुजर गईं, लेकिन आज तक कोई जिम्मेदारी लेने वाला नहीं है।


अब की बार सीधे जमीन पर अधिकार की लड़ाई

अब स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर अगले डेढ़ महीने में युवाओं को नौकरी और विस्थापितों की समस्याओं का समाधान नहीं हुआ, तो बड़ा आंदोलन होगा। लोग एकजुट होकर खाली पड़ी जमीन पर खुद हल चलाएंगे।


सिर्फ बोकारो ही नहीं, बल्कि चांडिल, मसानजोर, पंचेत, मैथन, घाटो और कोयलांचल जैसे इलाकों के विस्थापित भी इसी तरह अपने हक के लिए आवाज उठाएंगे।

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