Bokaro: झारखंड के बोकारो में जमीन अधिग्रहण का पुराना मुद्दा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है। भाजपा नेता और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन के हालिया बयान ने इस बहस को नया मोड़ दे दिया है।
उन्होंने कहा कि 1960 के दशक में बोकारो स्टील प्लांट के निर्माण के लिए लगभग 34,000 एकड़ जमीन अधिग्रहित की गई थी, लेकिन हैरानी की बात यह है कि इसका बड़ा हिस्सा आज भी उपयोग में नहीं लाया गया।
कानूनी सवाल! जमीन अधिग्रहण वैध या खत्म?
चंपई सोरेन ने सीधे तौर पर सवाल उठाया कि जब वर्षों तक जमीन का उपयोग नहीं हुआ और कई जगहों पर भौतिक कब्जा भी नहीं लिया गया, तो क्या यह अधिग्रहण कानूनन समाप्त नहीं माना जाना चाहिए?
उन्होंने भूमि अधिग्रहण कानून 2013 की धारा 24(2) का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे मामलों में जमीन मूल रैयतों को वापस मिलनी चाहिए।
पुनर्वास और बुनियादी सुविधाओं का संकट
जानकारी के अनुसार, बोकारो में 64 मौजों की जमीन अधिग्रहित की गई थी, लेकिन आज भी सैकड़ों गांवों के लोग पुनर्वास, मुआवजा और जमीन के स्वामित्व को लेकर संघर्ष कर रहे हैं।
स्थिति यह है कि लाखों लोग इन इलाकों में रहते हुए भी पंचायत व्यवस्था से बाहर हैं, जिससे वे बिजली, पानी, सड़क और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं।
रिकॉर्ड से गायब गांव, पहचान का संकट
मामला केवल जमीन तक सीमित नहीं है, बल्कि लोगों की पहचान तक प्रभावित हो रही है। कई गांव सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज ही नहीं हैं। लोग वोट तो डालते हैं, लेकिन जन्म और मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने जैसी बुनियादी प्रक्रियाएं भी उनके लिए मुश्किल बन गई हैं।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि एक ओर उन्हें अधिकारों से वंचित रखा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर उनकी जमीन पर व्यावसायिक निर्माण जैसे मॉल और अन्य प्रोजेक्ट तेजी से खड़े किए जा रहे हैं।
पुराने फैसलों का भी जिक्र
अपने बयान में सोरेन ने 1973 के उस निर्णय का भी उल्लेख किया, जिसमें बोकारो स्टील प्लांट प्रशासन ने 20 मौजा जमीन को अतिरिक्त घोषित किया था। इसके बावजूद, दशकों बीत जाने के बाद भी मूल जमीन मालिकों को उनका अधिकार वापस नहीं मिल सका।
आंदोलन की चेतावनी, “हल चलाओ” अभियान का संकेत
चंपई सोरेन ने साफ चेतावनी दी है कि यदि अगले डेढ़ महीने के भीतर विस्थापितों की समस्याओं का समाधान नहीं हुआ और प्रशिक्षित युवाओं को रोजगार नहीं मिला, तो एक बड़ा जन आंदोलन शुरू किया जाएगा।
उन्होंने संकेत दिया कि इस आंदोलन के तहत बड़ी संख्या में लोग एकजुट होकर प्लांट की खाली पड़ी जमीन पर हल चलाएंगे।
राज्यभर में फैल सकता है आंदोलन
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह मुद्दा केवल बोकारो तक सीमित नहीं रहेगा। चांडिल, मसानजोर, पंचेत, मैथन, घाटो और कोयलांचल जैसे अन्य परियोजना क्षेत्रों के विस्थापितों को भी इस आंदोलन से जोड़ा जाएगा।
ऐसे में आने वाले समय में झारखंड में व्यापक स्तर पर जन आंदोलन की स्थिति बन सकती है।
यह मामला सिर्फ जमीन का नहीं, बल्कि हजारों परिवारों के हक, पहचान और भविष्य से जुड़ा हुआ है जिसका समाधान अब और टाला नहीं जा सकता।