Jharkhand News: देवघर मार्केटिंग बोर्ड में महज 51 रुपये की दैनिक मजदूरी पर माली के रूप में करियर शुरू करने वाले मोती राम के लिए इंसाफ की सुबह हुई है. साल 2022 से चली लंबी कानूनी लड़ाई के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने देवघर के बमपास टाउन निवासी मोती राम की सेवा को नियमित करने का ऐतिहासिक आदेश सुनाया है. अदालत ने इस मामले में संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत प्राप्त अपने विशेषाधिकार का उपयोग करते हुए मार्केटिंग बोर्ड की आपत्तियों को खारिज कर दिया.
2001 में 10 आम के पौधों की देखभाल के लिए हुई थी नियुक्ति
मोती राम की कहानी जून 2001 में शुरू हुई थी, जब उन्हें देवघर मार्केटिंग बोर्ड के प्रशासनिक भवन परिसर में लगे आम के 10 पौधों की देखभाल के लिए दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी के तौर पर रखा गया था. उस समय उनकी मजदूरी मात्र 51 रुपये प्रतिदिन तय की गई थी. समय बीतने के साथ उनकी आर्थिक स्थिति चुनौतीपूर्ण बनी रही. साल 2015 में, उन्होंने कम मजदूरी का हवाला देते हुए वेतन बढ़ाने का अनुरोध किया, जिसके बाद तत्कालीन उपायुक्त ने उनका मानदेय बढ़ाकर 7,593 रुपये प्रति माह कर दिया था.
हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक का कानूनी संघर्ष
सेवा नियमित करने की उम्मीद तब जगी जब साल 2020 में जिला प्रशासन ने 10 वर्ष से अधिक समय से कार्यरत दैनिक कर्मियों से आवेदन मांगे. मोती राम ने भी आवेदन दिया, लेकिन कोई कार्रवाई न होने पर उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. शुरुआत में फरवरी 2023 में हाईकोर्ट की एकल पीठ ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी. हालांकि, जब मामला न्यायाधीश सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायाधीश राजेश कुमार की खंडपीठ के पास पहुंचा, तो अदालत ने 24 साल की लंबी सेवा को देखते हुए उनके पक्ष में फैसला सुनाया.
बोर्ड की दलीलों को शीर्ष अदालत ने नकारा
मार्केटिंग बोर्ड ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी. बोर्ड का मुख्य तर्क यह था कि माली का कोई पद स्वीकृत नहीं है, इसलिए नियमितीकरण संभव नहीं है. सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश पंकज मित्थल और न्यायाधीश एसवीएन भट्टी की पीठ ने मामले की गंभीरता को समझा. अदालत ने बोर्ड की दलीलों को दरकिनार करते हुए स्पष्ट किया कि एक कर्मचारी को दशकों तक दैनिक वेतन भोगी बनाकर रखना और फिर तकनीकी कारणों से नियमितीकरण से रोकना उचित नहीं है. इस फैसले के बाद अब मोती राम को स्थाई कर्मचारी का दर्जा मिलना तय हो गया है.
श्रमिकों के अधिकारों और प्रशासनिक जवाबदेही की जीत
मोती राम का मामला भारतीय न्याय व्यवस्था में उन हजारों दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों के लिए एक मिसाल है जो दशकों तक अस्थाई पदों पर काम करते रहते हैं. यह मामला प्रशासनिक विसंगति को भी उजागर करता है, जहां एक तरफ अनुभवी कर्मचारियों से काम लिया जाता है, वहीं दूसरी तरफ “पद स्वीकृत न होने” का हवाला देकर उन्हें उनके अधिकारों से वंचित रखा जाता है. सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनुच्छेद 136 का प्रयोग करना यह दर्शाता है कि जब निचली संस्थाएं या विभाग न्याय करने में विफल रहते हैं, तो शीर्ष अदालत मानवीय आधार और नैसर्गिक न्याय को प्राथमिकता देती है.