आपको बताते है, क्या है पूरा विवाद
याचिकाकर्ता का तर्क है कि UGC के नए नियम सामान्य वर्ग के छात्रों के प्रति भेदभावपूर्ण हैं। इन नियमों के तहत देश के सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता समितियों का गठन अनिवार्य किया गया है। नियमों के अनुसार, इन समितियों में निम्नलिखित वर्गों का प्रतिनिधित्व अनिवार्य है। अन्य पिछड़ा वर्ग OBC, अनुसूचित जाति SC, अनुसूचित जनजाति ST, महिलाएं और दिव्यांग श्रेणी
आइए जानते हैं कोर्ट में क्या हुआ
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने दलील दी कि इन नियमों के कारण देशभर के छात्र समुदाय में असंतोष है। अदालत ने मामले की गंभीरता को स्वीकार करते हुए कहा कि वह वर्तमान स्थिति से पूरी तरह अवगत है। इसी को देखते हुए कोर्ट ने तत्काल प्रभाव से नियमों पर रोक लगाने का आदेश दिया।
दुरुपयोग की आशंका
शिक्षा जगत के विशेषज्ञों और जानकारों का मानना है कि इन नए नियमों में स्पष्ट प्रक्रिया का अभाव है। जानकारों का कहना है कि नियमों की अस्पष्टता के कारण शिक्षण संस्थानों में इसका दुरुपयोग किया जा सकता है। यह सामान्य वर्ग के छात्रों के अधिकारों का हनन कर सकता है। समितियों के गठन की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है, जिससे संस्थानों के कामकाज में अनावश्यक हस्तक्षेप बढ़ सकता है।
जनहित याचिका पर अगली सुनवाई
कोर्ट अब 19 मार्च को केंद्र सरकार के जवाब की समीक्षा करेगा, जिसके बाद तय होगा कि ये समितियां लागू रहेंगी या इनमें बदलाव किया जाएगा।