Jharkhand Politics: झारखंड में प्रस्तावित नगर निकाय चुनावों को लेकर सियासत तेज हो गई है. विपक्ष के नेता बाबूलाल मरांडी ने मतदाता सूची को लेकर गंभीर आपत्ति जताई है और सरकार से चुनाव प्रक्रिया पर दोबारा विचार करने की मांग की है.
अद्यतन मतदाता सूची की मांग
बाबूलाल मरांडी ने कहा है कि नगर निकाय चुनाव यदि अक्टूबर 2024 की पुरानी मतदाता सूची के आधार पर कराए जाते हैं तो बड़ी संख्या में मतदाता अपने संवैधानिक अधिकार से वंचित रह जाएंगे. उनके अनुसार पिछले करीब 15 महीनों में जो नए मतदाता जुड़े हैं या जिन्होंने अपना पता स्थानांतरित कराया है, वे मतदान नहीं कर पाएंगे.
सोशल मीडिया के जरिए सरकार को घेरा
मरांडी ने इस मुद्दे को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर उठाया. उन्होंने लिखा कि जानकारी मिल रही है कि झारखंड में नगर निकाय चुनाव उसी वोटर लिस्ट से कराने की तैयारी है जिससे विधानसभा चुनाव हुए थे. इसका मतलब यह होगा कि एक अक्टूबर 2024 से पहले दर्ज मतदाता ही वोट डाल सकेंगे.
लोकतांत्रिक मूल्यों पर सवाल
विपक्ष के नेता ने कहा कि मतदाता सूची का नियमित पुनरीक्षण होता है, इसके बावजूद पुरानी सूची पर चुनाव कराना लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ है. उन्होंने इसे मतदाताओं के अधिकारों के साथ अन्याय बताया और कहा कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए हर योग्य मतदाता की भागीदारी जरूरी है.
चुनाव आयोग और सरकार से अपील
मरांडी ने मुख्य निर्वाचन अधिकारी झारखंड, मुख्यमंत्री कार्यालय और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को टैग करते हुए मांग की कि नगर निकाय चुनाव अद्यतन मतदाता सूची के आधार पर कराए जाएं. उन्होंने कहा कि इससे चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता और विश्वसनीयता बनी रहेगी.
युवाओं और नए मतदाताओं पर असर का दावा
यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब राज्य में नगर निकाय चुनावों की तैयारियां चल रही हैं. विपक्ष का कहना है कि पुरानी सूची के इस्तेमाल से सबसे ज्यादा नुकसान उन युवाओं को होगा जो हाल ही में 18 वर्ष के हुए हैं या जिनका पता बदला है. इस विषय पर सोशल मीडिया पर भी बहस तेज है.
आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार
फिलहाल चुनाव आयोग या राज्य सरकार की ओर से इस मुद्दे पर कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है. विशेषज्ञों का मानना है कि अद्यतन मतदाता सूची का उपयोग चुनावी प्रक्रिया को और पारदर्शी बना सकता है.
नगर निकाय चुनावों से पहले मतदाता सूची को लेकर उठा सवाल केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि राजनीतिक और लोकतांत्रिक महत्व का है. यदि पुरानी सूची पर चुनाव होते हैं तो यह विपक्ष को बड़ा मुद्दा दे सकता है, वहीं सरकार और चुनाव आयोग के सामने निष्पक्षता साबित करने की चुनौती भी खड़ी होगी.