National News: चुनावी बॉन्ड पर रोक लगने के बाद यह उम्मीद जताई जा रही थी कि राजनीतिक दलों की फंडिंग पर असर पड़ेगा. लेकिन भाजपा की ऑडिट रिपोर्ट एक अलग ही तस्वीर दिखाती है. वित्तीय वर्ष 2024-25 में पार्टी को 6,125 करोड़ रुपये का चंदा मिला और जनरल फंड बढ़कर 12,164 करोड़ रुपये तक पहुंच गया. यानी बॉन्ड बंद हुए, लेकिन पैसा पहले से ज्यादा आ गया. सवाल यह है कि यह फंडिंग किस रास्ते से आई और इतनी बड़ी रकम की जरूरत आखिर क्यों पड़ी?
80 करोड़ राशन पर, पार्टी हजारों करोड़ पर
देश में करीब 80 करोड़ लोग सरकारी राशन योजना पर निर्भर हैं. महंगाई और बेरोजगारी को लेकर आम लोग संघर्ष कर रहे हैं. ऐसे में एक राजनीतिक दल के पास 12,164 करोड़ रुपये का जनरल फंड होना कई सवाल खड़े करता है. क्या यह पैसा जनकल्याण से जुड़ा है या सिर्फ सत्ता को मजबूत बनाए रखने का साधन बन चुका है?
हंगर इंडेक्स और प्रेस फ्रीडम बनाम चुनावी खर्च
भारत की स्थिति ग्लोबल हंगर इंडेक्स और प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में लगातार चर्चा का विषय रही है. भूख, पोषण और मीडिया की स्वतंत्रता जैसे मुद्दों पर सवाल उठते रहे हैं. वहीं दूसरी ओर एक दल चुनाव प्रचार पर 3335.36 करोड़ रुपये खर्च कर रहा है. यह तुलना अपने आप में कटाक्ष है कि प्राथमिकता क्या है, भूख और अभिव्यक्ति या ब्रांडेड राजनीति.
चंदा बढ़ा, जनरल फंड फूला
रिपोर्ट के अनुसार 2023-24 में भाजपा को 3,967 करोड़ रुपये का चंदा मिला था, जो 2024-25 में बढ़कर 6,125 करोड़ रुपये हो गया. एक ही साल में 54 प्रतिशत की बढ़ोतरी. जनरल फंड भी 9,169 करोड़ से बढ़कर 12,164 करोड़ हो गया. पार्टी के पास 9,390 करोड़ रुपये की सावधि जमा है. केवल बैंक ब्याज से 634 करोड़ रुपये की आय हुई. आयकर रिफंड के रूप में 65.92 करोड़ रुपये का दावा किया गया और उस पर 4.40 करोड़ रुपये का ब्याज मिला. सवाल यह है कि क्या राजनीतिक दल अब चुनाव लड़ने वाली संस्था है या मुनाफा कमाने वाला फाइनेंशियल पावरहाउस?
चुनावी खर्च में बेमिसाल उछाल
भाजपा का चुनावी खर्च एक साल में लगभग दोगुना हो गया. 2023-24 में 1,754.06 करोड़ रुपये खर्च हुए थे, जबकि 2024-25 में यह आंकड़ा 3,335.36 करोड़ रुपये तक पहुंच गया. यह खर्च पार्टी के कुल वार्षिक खर्च का 88.36 प्रतिशत है. यानी पार्टी का लगभग सारा पैसा चुनाव पर ही खर्च हो रहा है.
रिपोर्ट के अनुसार
- इलेक्ट्रॉनिक मीडिया प्रचार पर 1125 करोड़ रुपये खर्च किए गए.
- विज्ञापनों पर 897 करोड़ रुपये खर्च हुए.
- कटआउट होर्डिंग्स और बैनरों पर 107 करोड़ रुपये खर्च किए गए.
- विमान और हेलीकॉप्टर यात्राओं पर 583 करोड़ रुपये खर्च किए गए.
- उम्मीदवारों को वित्तीय सहायता के रूप में 312.9 करोड़ रुपये दिए गए.
- रैलियों और अभियानों पर 90.93 करोड़ रुपये खर्च हुए.
- संगठनात्मक बैठकों पर 51.72 करोड़ रुपये खर्च दर्ज किया गया.
ये आंकड़े दिखाते हैं कि पैसा जमीन पर मुद्दे सुलझाने से ज्यादा छवि और प्रचार पर बहाया गया.
क्या वोटर के लिए नुकसानदेह है इतना पैसा
जब एक दल के पास प्रचार के लिए हजारों करोड़ हों, तो चुनावी मुकाबला असमान हो जाता है. छोटे दल और स्वतंत्र उम्मीदवार पीछे छूट जाते हैं. मतदाता तक पहुंचने का माध्यम पैसा बन जाता है, विचार नहीं. नतीजा यह होता है कि लोकतंत्र बहस से ज्यादा ब्रांड मैनेजमेंट में बदल जाता है.
सत्ता और धन का केंद्रीकरण
नेतृत्व परिवर्तन के बाद पार्टी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन को इस पूरे फंड के उपयोग का अधिकार मिल गया है. रिपोर्ट के अनुसार 2024-25 में खातों में 2,882.32 करोड़ रुपये की शुद्ध वृद्धि दर्ज हुई. यह स्थिति बताती है कि सत्ता के साथ आर्थिक शक्ति भी सीमित हाथों में सिमटती जा रही है.
भारतीय राजनीति की दिशा पर सवाल
भाजपा की ऑडिट रिपोर्ट केवल एक दल की आर्थिक सेहत नहीं दिखाती, बल्कि भारतीय राजनीति की दिशा पर सवाल खड़े करती है. जब देश का बड़ा हिस्सा राशन, रोजगार और अभिव्यक्ति की आजादी जैसे मुद्दों से जूझ रहा है, तब चुनावी प्रचार पर हजारों करोड़ का खर्च यह सोचने पर मजबूर करता है कि लोकतंत्र जनता के लिए है या पूंजी के दम पर सत्ता बनाए रखने की प्रक्रिया बन चुका है. सवाल चंदे का नहीं, प्राथमिकता का है.