Shibu Soren Birth Anniversary: झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक, झारखंड आंदोलन के पुरोधा और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री दिशोम गुरु शिबू सोरेन की आज 82वीं जयंती मनाई जा रही है. 11 जनवरी 1944 को जन्मे शिबू सोरेन का 4 अगस्त 2025 को निधन हुआ था आज उनकी 82वीं जयंती है, जिसे पूरे झारखंड में श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाया जा रहा है. राजधानी रांची में आयोजित मुख्य कार्यक्रम में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मौजूदगी में दिशोम गुरु को श्रद्धांजलि अर्पित की जाएगी. धनबाद समेत राज्य के सभी जिलों में झामुमो के नेता, कार्यकर्ता और समर्थक स्मृति सभाओं और श्रद्धांजलि कार्यक्रमों के जरिए अपने नेता को याद कर रहे हैं.
संघर्ष से गढ़ी गई राजनीतिक यात्रा
शिबू सोरेन का जन्म रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में हुआ था. उनके पिता सोबरन मांझी शिक्षक थे और आदिवासियों के अधिकारों के लिए आवाज उठाते थे. उस समय महाजन कर्ज के जाल में फंसाकर आदिवासियों की जमीन हड़प लेते थे. सोबरन मांझी ने इसका विरोध किया, जिसकी कीमत उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ी. जब यह घटना हुई तब शिबू सोरेन मात्र 13 वर्ष के थे. पिता की हत्या ने उनके जीवन की दिशा तय कर दी और अन्याय के खिलाफ संघर्ष की नींव यहीं से पड़ी.
धनकटनी आंदोलन से मिली पहचान
पिता की हत्या के बाद शिबू सोरेन ने महाजनों के खिलाफ धनकटनी आंदोलन की शुरुआत की. इस आंदोलन में आदिवासी अपने हक की फसल महाजनों के खेतों से काटकर ले जाते थे. तीर धनुष से लैस आदिवासी युवाओं का घेरा इस आंदोलन की पहचान बना. एक चर्चित घटना में जब पुलिस उन्हें पकड़ने गांव पहुंची तो शिबू सोरेन ने खुद रास्ता दिखाया और गांव पहुंचते ही महिलाओं ने पुलिस को घेर लिया. इस आंदोलन ने उन्हें आदिवासी समाज का निर्विवाद नेता बना दिया और इसी दौर में उन्हें दिशोम गुरु की उपाधि मिली.
झारखंड आंदोलन के केंद्रीय नेता
अलग झारखंड राज्य की लड़ाई में शिबू सोरेन की भूमिका निर्णायक रही. बिनोद बिहारी महतो और कॉमरेड एके राय के साथ मिलकर उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना की. 4 फरवरी 1973 को धनबाद में झामुमो अस्तित्व में आया. संसदीय राजनीति में उन्होंने 1980 में दुमका से लोकसभा चुनाव जीतकर राष्ट्रीय राजनीति में कदम रखा. इसके बाद वे 8 बार दुमका का प्रतिनिधित्व करते रहे और केंद्र की नरसिम्हा राव तथा मनमोहन सिंह सरकार में मंत्री भी बने.
टुंडी से उठा आंदोलन का स्वर
शिबू सोरेन की राजनीतिक पहचान धनबाद के टुंडी क्षेत्र से बनी. यहीं से उन्होंने 1970 के दशक में महाजनी प्रथा और भूमि हड़पने के खिलाफ आंदोलन शुरू किया. धनकटनी आंदोलन के दौरान आदिवासी महिलाएं फसल काटती थीं और पुरुष उनकी सुरक्षा करते थे. इसी आंदोलन ने उन्हें गुरुजी और दिशोम गुरु के रूप में पहचान दिलाई और वे आदिवासी अधिकारों के प्रतीक बनकर उभरे.
मुख्यमंत्री बने पर पूरा कार्यकाल नहीं
शिबू सोरेन का राजनीतिक जीवन उपलब्धियों के साथ साथ विडंबनाओं से भी भरा रहा. वर्ष 2005 में खंडित जनादेश के बाद वे मुख्यमंत्री बने लेकिन बहुमत साबित नहीं कर सके. इसके बाद 2008 और 2009 में भी उन्होंने मुख्यमंत्री पद संभाला, लेकिन कभी विधायकी तो कभी राजनीतिक परिस्थितियों के कारण उन्हें पद छोड़ना पड़ा. यह ऐतिहासिक तथ्य है कि झारखंड राज्य के निर्माण में अहम भूमिका निभाने वाले नेता को कभी पूर्ण कार्यकाल का अवसर नहीं मिला.
हेमंत सोरेन आगे बढ़ा रहे विरासत
दिशोम गुरु की राजनीतिक और वैचारिक विरासत को आज उनके पुत्र और वर्तमान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन आगे बढ़ा रहे हैं. शिबू सोरेन भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका संघर्ष, उनकी आवाज और उनका सपना झारखंड की राजनीति और समाज को आज भी दिशा दे रहा है.
झारखंड के संघर्ष, पहचान और आत्मसम्मान की कहानी
शिबू सोरेन की जयंती केवल स्मरण का अवसर नहीं है बल्कि यह झारखंड के संघर्ष, पहचान और आत्मसम्मान की कहानी को दोहराने का दिन भी है. उनका जीवन बताता है कि जमीन से जुड़ा आंदोलन कैसे सत्ता तक पहुंच सकता है और कैसे एक व्यक्ति पूरे राज्य की चेतना बन सकता है.