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  • 2026-07-04

Ranchi News : भानु प्रताप शाही का वित्त मंत्री पर तीखा हमला कहा:- किशोर भैया आत्ममंथन कीजिए

Ranchi News : झारखंड के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर द्वारा सरकारी सुरक्षा वापस किए जाने और हाल के दिनों में सरकार के भीतर सामने आए मतभेदों के बीच भाजपा ने उन पर तीखा हमला बोला है। भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष और पूर्व स्वास्थ्य मंत्री भानु प्रताप शाही ने वित्त मंत्री के नाम खुला पत्र जारी कर कहा कि जनता के मुद्दों पर संघर्ष करने के बजाय वे व्यक्तिगत सुरक्षा जैसे विषय को लेकर सरकार से टकराव का संदेश दे रहे हैं।


जनता के मुद्दों पर लड़ने के बजाय सुरक्षा को बना रहे मुद्दा

भानु प्रताप शाही ने अपने पत्र में कहा कि जिस राज्य में कानून-व्यवस्था को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हों वहां वित्त मंत्री का सरकारी सुरक्षा लौटाकर अकेले मॉर्निंग या इवनिंग वॉक करना जनता की समस्याओं का समाधान नहीं है। उन्होंने कहा कि राधाकृष्ण किशोर 46 वर्षों के राजनीतिक अनुभव वाले वरिष्ठ नेता हैं और उनसे अपेक्षा थी कि वे जनता से जुड़े बड़े मुद्दों पर सरकार के खिलाफ मुखर भूमिका निभाते।

उन्होंने पलामू की राजनीतिक विरासत का उल्लेख करते हुए पूर्व विधानसभा अध्यक्ष इंदर सिंह नामधारी और दिवंगत नेता चंद्रशेखर दुबे उर्फ ददई दुबे का उदाहरण दिया। उनका कहना था कि इन नेताओं ने जनहित और सिद्धांतों के लिए सत्ता से टकराने में कभी संकोच नहीं किया जबकि राधाकृष्ण किशोर भोजपुरी-मगही भाषा और क्षेत्रीय अस्मिता जैसे मुद्दों पर मौन रहे।

अभी भी वक्त है आत्ममंथन कीजिए

भाजपा नेता ने पत्र में कहा कि पलामू की जनता को उम्मीद थी कि वित्त मंत्री क्षेत्रीय अस्मिता और भाषा के मुद्दों पर ऐतिहासिक पहल करेंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने लिखा कि आपके नाम में राधा और कृष्ण दोनों समाहित हैं लेकिन पलामू के ये कृष्ण जनता के खिलाफ हो रहे अन्याय के विरुद्ध सुदर्शन चक्र उठाने के बजाय व्यक्तिगत स्वार्थ और वीआईपी सुरक्षा जैसे मामूली मुद्दे पर सरकार से लड़ते दिखाई दे रहे हैं।

भानु प्रताप शाही ने आगे कहा कि राधाकृष्ण किशोर अपने कड़े तेवरों और प्रखर राजनीति के लिए जाने जाते रहे हैं लेकिन अब ऐसा प्रतीत होता है कि सत्ता का मोह सरकारी सुविधाएं और व्यक्तिगत हित जनता के मुद्दों से ऊपर हो गए हैं। उन्होंने पत्र के अंत में वित्त मंत्री से आत्ममंथन करने की अपील करते हुए कहा कि पलामू की तासीर समझौतावादी नहीं संघर्षवादी रही है। सोचिए क्योंकि अभी भी वक्त है।


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