Ranchi News : झारखंड हाईकोर्ट ने जनहित याचिका (PIL) के दुरुपयोग पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा है कि कई बार पेशेवर मुकदमेबाज PIL की आड़ में न्यायिक प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल करते हैं, जिसे रोकना आवश्यक है। अदालत ने शिव शंकर शर्मा की सिविल रिव्यू याचिका खारिज करते हुए अपने पूर्व आदेश को बरकरार रखा।
रिव्यू याचिका में नहीं मिला कोई नया आधार
चीफ जस्टिस एम.एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया। यह रिव्यू याचिका 9 मई 2025 के उस आदेश के खिलाफ दायर की गई थी, जिसमें अदालत ने उनकी जनहित याचिका को न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग बताते हुए खारिज कर दिया था और 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया था।
खंडपीठ ने कहा कि रिव्यू याचिका में ऐसा कोई आधार प्रस्तुत नहीं किया गया जिससे रिकॉर्ड में कोई स्पष्ट त्रुटि साबित हो सके। इसलिए पूर्व फैसले पर पुनर्विचार का कोई कारण नहीं बनता।
सिर्फ आधार कार्ड से नहीं साबित होती PIL दायर करने की पात्रता
अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता ने अपनी विश्वसनीयता साबित करने के लिए केवल यह दावा किया कि उनका कोई निजी हित नहीं है और आधार कार्ड संलग्न किया है। ऐसे सामान्य दावे किसी व्यक्ति की साख या जनहित याचिका दायर करने की पात्रता सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि रजिस्ट्री द्वारा PIL नियमों की औपचारिक जांच पूरी हो जाना इस बात का प्रमाण नहीं है कि अदालत ने याचिकाकर्ता की साख, नीयत या पात्रता को स्वीकार कर लिया है।
इसके अलावा अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता ने 50 हजार रुपये का जुर्माना समय पर जमा नहीं किया और रिव्यू याचिका लंबित होने का हवाला देकर भुगतान टालते रहे। अदालत ने इसे भी न्यायिक प्रक्रिया के अनुरूप आचरण नहीं माना।