Ranchi News: झारखंड की राजधानी रांची में मवेशी चोरों ने तस्करी का एक ऐसा तरीका निकाला है जिसने पुलिस के भी होश उड़ा दिए हैं. अब तस्कर मवेशियों को ढोने के लिए पुराने ट्रकों या पिकअप वैन के बजाय महंगी लग्जरी गाड़ियों का इस्तेमाल कर रहे हैं. रईसों वाली इन गाड़ियों पर अमूमन पुलिस या आम जनता को शक नहीं होता, जिसका फायदा उठाकर ये तस्कर ग्रामीण इलाकों से मवेशियों को पार कर रहे हैं. हाल ही में सुखदेवनगर पुलिस द्वारा की गई गिरफ्तारियों के बाद इस वीआईपी तस्करी का खुलासा हुआ है.
रेकी से लेकर वधशाला तक फैला है संगठित नेटवर्क
पकड़े गए आरोपियों, मोहम्मद मुर्तजा और मोहम्मद सादिक ने पूछताछ में पुलिस को बताया कि यह पूरा खेल बेहद योजनाबद्ध तरीके से चलता है. गिरोह के सदस्य पहले लग्जरी गाड़ियों से सुनसान ग्रामीण इलाकों की रेकी करते हैं और मौका मिलते ही मवेशियों को गाड़ी में ठूंसकर फरार हो जाते हैं. चोरी किए गए इन पशुओं को तुरंत कांटाटोली, आजाद बस्ती और हिंदपीढ़ी जैसे इलाकों में स्थित अवैध वधशालाओं में बेच दिया जाता है. हैरानी की बात यह है कि चोरी के बाद सबूत मिटाने के लिए मवेशियों को ज्यादा समय तक अपने पास नहीं रखा जाता.
एक ही पैटर्न पर राज्य भर में हो रही हैं वारदातें
मवेशी तस्करी के इस नए ट्रेंड के कई मामले हाल के दिनों में सामने आए हैं. 18 अप्रैल को सुखदेवनगर पुलिस ने स्विफ्ट कार में मवेशी ले जाते तीन तस्करों को दबोचा, तो वहीं 19 अप्रैल को पिठोरिया पुलिस ने तीन बोलेरो गाड़ियों को जब्त किया जिनमें मवेशी लदे थे. इससे पहले बुंडू पुलिस ने भी टाटा-रांची मार्ग पर कार से तस्करी कर रहे गिरोह का पर्दाफाश किया था. ये घटनाएं साबित करती हैं कि शहर में कई संगठित गिरोह सक्रिय हैं, जिनमें रेकी करने वाले और ट्रांसपोर्ट संभालने वाले गुर्गों की भूमिका अलग-अलग तय है.
खरीदारों तक पहुंचने में पुलिस के हाथ अब भी खाली
तस्करों की गिरफ्तारी के बावजूद रांची पुलिस के लिए सबसे बड़ी चुनौती इस गिरोह के खरीदारों तक पहुंचना है. पुलिस अब तक उन मुख्य सरगनाओं और अवैध वधशाला संचालकों का पता नहीं लगा पाई है जो इस पूरे सिंडिकेट को आर्थिक मदद देते हैं. हालांकि, सुखदेवनगर और पिठोरिया पुलिस ने कई आरोपियों को जेल भेज दिया है, लेकिन शहर के भीतर फैले इस अवैध नेटवर्क को पूरी तरह ध्वस्त करना अब भी एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती बना हुआ है.