Currency Crisis: मिडिल ईस्ट में जारी तनाव और महंगे होते तेल-गैस इम्पोर्ट ने भारतीय रुपये को लगातार कमजोर किया है। रुपया हाल ही में अपने अब तक के सबसे निचले स्तर के करीब पहुंच गया, यहां तक कि 95 प्रति डॉलर के पार भी गया। यह स्थिति कुछ हद तक जापान जैसी दिख रही है, जहां येन भी डॉलर के मुकाबले काफी गिर चुका है। ग्लोबल अनिश्चितता और फॉरेन एक्सचेंज मार्केट के दबाव ने रुपये की स्थिति को और चुनौतीपूर्ण बना दिया है।
आसान नीतियां और पूंजी निकासी का असर
RBI की ग्रोथ-फ्रेंडली नीतियां, जैसे ब्याज दरों में कटौती और सिस्टम में भारी लिक्विडिटी डालना, भी उल्टा असर डालती दिखीं। विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार से बड़ी मात्रा में पैसा निकालकर डॉलर में निवेश किया, जिससे बैंकिंग सिस्टम में फंडिंग टाइट हो गई। पिछले एक साल में करीब 26 बिलियन डॉलर का आउटफ्लो इस दबाव को और बढ़ाता है।
बैंकिंग सेक्टर पर बढ़ती चुनौतियां
रुपये की गिरावट और महंगे इम्पोर्ट का असर बैंकिंग सेक्टर पर भी दिख रहा है। लोन ग्रोथ धीमी पड़ सकती है और खासकर MSME सेक्टर में जोखिम बढ़ सकता है। हालांकि बैंकों की एसेट क्वालिटी अभी मजबूत है, लेकिन RBI अब संभावित NPA को लेकर पहले से तैयारी करने के निर्देश दे रहा है। सरकारी बैंकों के लिए यह चुनौती ज्यादा कठिन हो सकती है।
क्या ब्याज दर बढ़ाना ही रास्ता है?
विशेषज्ञों का मानना है कि महंगाई और रुपये की गिरावट को रोकने के लिए RBI को अब ब्याज दरें बढ़ानी पड़ सकती हैं। इससे लोन महंगे होंगे, मांग घटेगी और महंगाई पर काबू पाने में मदद मिल सकती है। अगर समय पर कदम नहीं उठाया गया, तो आर्थिक स्थिरता और लोगों का भरोसा दोनों प्रभावित हो सकते हैं।